‘मैडम को महत्व नहीं’! मंत्रालय में बढ़ी नाराजगी, क्या बड़े फैसलों से किया जा रहा किनारा?

प्रदेश के एक महत्वपूर्ण विभाग में इन दिनों प्रशासनिक और राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। मंत्रालय के गलियारों में यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि विभाग से जुड़ी कई अहम गतिविधियों और निर्णयों में प्रमुख सचिव एवं विभागीय सचिव की भूमिका पहले जैसी प्रभावी दिखाई नहीं दे रही है। विभाग से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच यह विषय लगातार चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिससे विभाग के भीतर बदलते शक्ति संतुलन को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

बताया जा रहा है कि वर्ष 1997 बैच की एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, जो विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रही हैं, इन चर्चाओं के केंद्र में हैं। मंत्रालय के जानकार सूत्रों का कहना है कि विभागीय मामलों में पहले जहां उनकी सक्रियता और प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता था, वहीं हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण निर्णयों और प्रक्रियाओं में उनकी भूमिका सीमित नजर आने की बातें सामने आ रही हैं। हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मंत्रालय के गलियारों में यह मुद्दा लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।

चर्चाओं के अनुसार, विभागीय कार्यप्रणाली में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले हैं जिनके बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या निर्णय प्रक्रिया में प्राथमिकताएं बदल रही हैं या फिर जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया जा रहा है। कुछ अधिकारी इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा मान रहे हैं, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि इसके पीछे विभाग के भीतर चल रहे आंतरिक समीकरण भी हो सकते हैं। यही वजह है कि इस विषय पर अटकलों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा।

फिलहाल विभाग या सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन मंत्रालय में चल रही चर्चाएं यह संकेत जरूर दे रही हैं कि विभाग के भीतर प्रभाव, अधिकार और निर्णय क्षमता को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। आने वाले समय में यदि इस विषय पर कोई प्रशासनिक निर्णय या बदलाव सामने आता है, तो उससे इन चर्चाओं की दिशा और तस्वीर दोनों स्पष्ट हो सकती हैं। तब तक मंत्रालय में यही सवाल गूंज रहा है कि आखिर ‘मैडम को महत्व नहीं’ वाली चर्चा के पीछे वास्तविकता क्या है।

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