
जब योग्यता को दरकिनार कर ‘वफादारी’ बन जाती है पावर का पैमाना, तब लोकतंत्र का क्या होता है? ब्रांडवाणी समाचार की विशेष रिपोर्ट।
आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश की प्रशासनिक सेवाओं (IAS और IPS) को ‘स्टील फ्रेम’ यानी देश का ‘लोह स्तंभ’ कहा था। उनका मानना था कि सरकारें आएंगी और जाएंगी, लेकिन यह स्टील फ्रेम देश को बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के मजबूती से थामे रखेगा। राष्ट्रहित सर्वोपरि होगा।
लेकिन आज? आज का कड़वा सच यह है कि यह ‘स्टील फ्रेम’ धीरे-धीरे धाराशायी होता दिख रहा है। आरोप लग रहे हैं कि आज योग्यता, दूरदर्शिता और राष्ट्रहित की जगह केवल एक ही पैमाना बचा है—’राजनीतिक निष्ठा’।
वह दौर शायद इतिहास की किताबों में दर्ज हो चुका है जब नौकरशाही देश के विकास के लिए बेखौफ होकर नीतियां बनाती थी। आज की कड़वी सच्चाई यह है कि जैसे ही सत्ता बदलती है, प्रशासनिक गलियारों में ‘चुनिंदा चेहरों’ को ढूँढने का खेल शुरू हो जाता है।
बदले की राजनीति: पिछली सरकार में अहम पदों पर बैठे योग्य अधिकारियों को सिर्फ इसलिए हाशिए पर धकेल दिया जाता है क्योंकि वे किसी और के कार्यकाल में काम कर रहे थे।
अपनों को पावर: योग्यता और वरिष्ठता को दरकिनार कर, नए चेहरों को सिर्फ इसलिए पावर में लाया जाता है ताकि वे सरकारों के अनुरूप, उनके इशारों पर काम कर सकें।
मौन समझौता: दुखद पहलू यह भी है कि देश के सबसे ऊंचे पदों पर बैठे ये ब्यूरोक्रेट्स भी अपनी मर्जी से ‘कब्जे में’ रहना पसंद कर रहे हैं। पावर में बने रहने की भूख ने आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की जुबान पर ताला लगा दिया है। वे चुपचाप सत्ता के आदेशों का पालन कर रहे हैं, भले ही वह जनहित में हो या न हो।
बात सिर्फ प्रशासनिक सेवाओं तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाने वाली मीडिया और कार्यपालिका के बाद, अब जनता की आखिरी उम्मीद—’न्यायपालिका’ पर भी सवाल उठने लगे हैं।
आज देश के प्रबुद्ध नागरिकों और विश्लेषकों के बीच यह गंभीर चिंता का विषय बन गया है कि क्या न्यायपालिका भी पूरी तरह से सरकार के चंगुल में फंस चुकी है? जब देश के सर्वोच्च स्तंभों से जनता का विश्वास उठने लगे, जब अदालतें और कानून व्यवस्था निष्पक्ष दिखने के बजाय सत्ता के प्रति झुकी हुई नजर आने लगें, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था वेंटिलेटर पर आ चुकी है।
यदि देश की ब्यूरोक्रेसी गूंगी हो जाए और न्यायपालिका मौन, तो सरकारों की मनमानी को रोकने वाला कोई नहीं बचता।
1. योजनाओं का पतन: देश का विकास करने वाली योजनाओं का निर्माण अब विशेषज्ञ नहीं, बल्कि राजनीतिक फायदे को देखकर किया जाने लगा है।
2. जनता का अविश्वास: जब आम आदमी को लगने लगे कि उसे न्याय नहीं मिलेगा, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाती है।
3. संस्थागत पतन: संस्थाएं किसी व्यक्ति या पार्टी से बड़ी होती हैं, लेकिन आज संस्थाओं को बौना बना दिया गया है।
सरदार पटेल का वह ‘स्टील फ्रेम’ आज जंग खा चुका है। देश की जनता आज यह सवाल पूछ रही है कि क्या हम वाकई एक स्वतंत्र लोकतंत्र में जी रहे हैं, या फिर एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ सिर्फ सत्ता का हुक्म चलता है?
जब तक ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी नहीं करेंगी, तब तक ‘राष्ट्रहित’ सिर्फ भाषणों का हिस्सा बना रहेगा और धरातल पर सिर्फ ‘राजनीतिक हित’ का तांडव होगा।
इस गंभीर स्थिति पर आपकी क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि हमारी संस्थाएं अब स्वतंत्र नहीं रहीं? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें
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