
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान का प्रहरी माना जाता है। लेकिन जजों की नियुक्ति से लेकर बेंच के गठन और सरकार के साथ अदालतों के संबंध तक, कई मुद्दे लगातार बहस का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता व्यवहार में कितनी मजबूत है? क्या अदालतों पर सरकार का दबाव होता है या फिर व्यवस्था और संस्थागत प्रक्रिया ही ऐसे सवाल खड़े करती हैं? सुप्रीम कोर्ट भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा मानता है।
केशवानंद भारती ने तय की संसद की सीमा
1973 का केशवानंद भारती फैसला भारतीय संवैधानिक इतिहास का अहम मोड़ माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की संविधान पीठ ने 7-6 के बहुमत से ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ सिद्धांत स्थापित किया। इसके तहत संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति है, लेकिन वह संविधान की मूल संरचना को खत्म नहीं कर सकती। यही सिद्धांत आगे चलकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता की बहस का महत्वपूर्ण आधार बना। सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी केशवानंद भारती मामले को दर्ज किया गया है।
NJAC से कालेजियम तक क्यों जारी है बहस?
जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर कॉलेजियम प्रणाली और सरकार की भूमिका पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। 2014 में संसद ने National Judicial Appointments Commission यानी NJAC के जरिए नियुक्ति व्यवस्था बदलने की कोशिश की। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने 99वें संविधान संशोधन और NJAC कानून को रद्द कर दिया। अदालत के फैसले में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जजों की नियुक्ति में न्यायिक भूमिका से जुड़े संवैधानिक सवालों पर विस्तार से विचार किया गया था।
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‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ होने के बाद CJI की भूमिका कितनी अहम?
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार CJI ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ होते हैं। इसका मतलब है कि मामलों को अलग-अलग बेंच के सामने रखने और बेंचों के गठन से जुड़ी प्रशासनिक भूमिका CJI के पास होती है। 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इस भूमिका को स्वीकार किया गया था। अदालत ने CJI को ‘first among equals’ बताते हुए यह भी स्पष्ट किया कि इस शक्ति का इस्तेमाल निष्पक्ष, न्यायसंगत और पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 2026 के लिए न्यायाधीशों का रोस्टर भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।
यहीं से पारदर्शिता का सवाल सामने आता है। संवेदनशील या संवैधानिक महत्व के मामलों में किस बेंच को सुनवाई करनी है, यह प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होनी चाहिए? यह सवाल किसी एक सरकार या किसी एक CJI तक सीमित नहीं है। यह न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है।
ADM जबलपुर से आज तक क्यों याद किया जाता है आपातकाल दौर?
आपातकाल के दौरान हुआ ADM जबलपुर मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे विवादित अध्यायों में शामिल है। उस समय सुप्रीम कोर्ट के बहुमत ने आपातकाल के दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और हिरासत से जुड़े अधिकारों को लेकर सरकार के पक्ष में फैसला दिया था। बाद में इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई और इसे मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण न्यायिक चेतावनी के तौर पर देखा गया। इसलिए आज भी यह सवाल उठता है कि जब सरकार और नागरिक के अधिकार आमने-सामने हों, तो अदालतें संविधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा कितनी मजबूती से करती हैं?
सवाल सरकार से भी, सिस्टम से भी
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ सरकार के हर फैसले का विरोध करना नहीं है। वहीं सरकार की संवैधानिक भूमिका का मतलब न्यायिक संस्थाओं पर प्रभाव बढ़ाना भी नहीं हो सकता। लोकतंत्र में दोनों संस्थाओं के बीच संवैधानिक संतुलन जरूरी है। इसलिए बहस किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष की बजाय प्रक्रिया, पारदर्शिता और जवाबदेही पर होनी चाहिए।
क्या जजों की नियुक्ति और बेंच गठन की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाया जा सकता है? क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी सुनिश्चित हो सकती है? और सबसे बड़ा सवाल-CJI अब क्या करेंगे, जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर ऐसे सवाल लगातार उठ रहे हैं?
केशवानंद भारती से NJAC और ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ तक की बहस एक ही मूल सवाल के आसपास घूमती है-संविधान के तहत सत्ता का संतुलन कैसे कायम रहे? सरकार हो या न्यायपालिका, लोकतंत्र में किसी भी संस्था की विश्वसनीयता उसकी संवैधानिक सीमाओं, पारदर्शिता और जवाबदेही से मजबूत होती है।
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