
विज्ञापन से लेकर इवेंट तक… कमीशन का ऐसा गणित कि सरकारें बदल गईं पर ‘सिस्टम‘ नहीं बदला; क्या मोहन यादव के ‘सुशासन‘ में भी जारी रहेगी वसूली की यह पुरानी परंपरा?
विशेष संवाददाता, भोपाल
मध्य प्रदेश में सरकारें बदलती हैं, मुख्यमंत्री बदलते हैं और नारे भी बदल जाते हैं। लेकिन अगर कुछ नहीं बदलता, तो वह है जनसंपर्क विभाग और ‘माध्यम‘ (Madhyam) के भीतर चल रहा कमीशनखोरी का वो ‘अनोखा‘ खेल, जिसकी जड़ें सचिवालय की दीवारों से भी गहरी हैं। कहने को तो ये विभाग सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुँचाते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि यहाँ उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि ‘परसेंटेज‘ और ‘बिल सेटलमेंट‘ का मैनेजमेंट पहुँचाया जाता है।
काम देने से बिल भुगतान तक… हर मेज पर ‘मैनेजमेंट‘
इस विभाग की कार्यप्रणाली किसी सरकारी दफ्तर जैसी कम और एक ‘कॉर्पोरेट वसूली सिंडिकेट‘ जैसी ज्यादा लगती है। जब कोई अन्य विभाग विज्ञापन या इवेंट के लिए जनसंपर्क या माध्यम को बजट आवंटित करता है, तो असली खेल वहीं से शुरू होता है। विज्ञापन प्रकाशन और इवेंट मैनेजमेंट के टेंडर उन चुनिंदा चेहरों को मिलते हैं जो ‘मैनेजमेंट‘ में माहिर हैं।
जानकारों की मानें तो काम मिलने की शुरुआत से लेकर बिल के अंतिम भुगतान तक, भ्रष्टाचार का एक लंबा गलियारा पार करना पड़ता है। बिल की कुल राशि का एक बड़ा हिस्सा उन अधिकारियों की जेब में जाता है, जिन्हें तकनीकी तौर पर लोक सेवक कहा जाता है, लेकिन व्यवहार में वे ‘कलेक्शन एजेंट‘ की भूमिका निभा रहे हैं।
अधिकारी या कलेक्शन एजेंट?
हैरानी की बात यह है कि सत्ता किसी भी दल की हो, इन विभागों में मलाईदार कुर्सियों पर उन्हीं अधिकारियों की तैनाती की जाती है जो ‘कलेक्शन‘ की कला में माहिर होते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या डॉ. मोहन यादव की सरकार में भी वही पुराना ढर्रा चलेगा? जिस सरकार को भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस‘ के लिए जाना जाना चाहिए, क्या वहां अब भी अधिकारी नहीं, बल्कि ‘कलेक्शन एजेंट‘ ही विभाग चलाएंगे?
जनसंपर्क और माध्यम की ‘अनोखी‘ जुगलबंदी
- परसेंटेज का खेल: विज्ञापन के बिलों में से एक निश्चित हिस्सा पहले ही ‘फिक्स‘ कर लिया जाता है।
- पसंदीदा वेंडर: इवेंट के नाम पर करोड़ों के बिल फाड़े जाते हैं और काम उन्हीं को मिलता है जो ‘रिटर्न गिफ्ट‘ देने में सक्षम होते हैं।
- भ्रष्टाचार का लिफाफा: सालों से चल रहे इस खेल में कई अधिकारी ऐसे हैं जो दशकों से इन्हीं विभागों के इर्द-गिर्द जमे हुए हैं, मानों विभाग उनकी निजी जागीर हो।
सुशासन की कसौटी पर मोहन सरकार
मध्य प्रदेश में ‘मोहन यादव‘ के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश को उम्मीद थी कि प्रशासनिक तंत्र में बड़ी सर्जरी होगी। लेकिन जनसंपर्क और माध्यम की फाइलों में दबा भ्रष्टाचार का जिन्न आज भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। जब तक इन विभागों में बैठे ‘कलेक्शन एजेंट‘ रूपी अधिकारियों को हटाया नहीं जाता, तब तक सरकार की छवि चमकाने वाले ये विज्ञापन जनता के पैसे की बर्बादी और भ्रष्टाचार की नुमाइश ही रहेंगे।
यह महज भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि व्यवस्था का वो दीमक है जो सरकारी खजाने को खोखला कर रहा है। आने वाले दिनों में हम उन चेहरों और फाइलों का भी खुलासा करेंगे जो इस सिंडिकेट के असली सरगना हैं।







