क्या ‘विकास’ की बलि चढ़ेंगे आदिवासी? अडानी के आगे नतमस्तक तंत्र और मुआवजे का ‘अकाल’?

सिंगरौली। ऊर्जा धानी कहे जाने वाले सिंगरौली की धरती पर इस वक्त ‘विकास‘ के नाम पर विनाश का वो खेल चल रहा है, जिसकी चीखें शायद भोपाल और दिल्ली के गलियारों तक नहीं पहुँच रही हैं। आरोप है कि अडानी समूह के प्रोजेक्ट्स के लिए स्थानीय लोगों, विशेषकर गरीब आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, लेकिन मुआवजे के नाम पर उनके हाथ सिर्फ सन्नाटा है।

सत्ता का ‘अडानी प्रेम‘ या जनता से द्रोह?

सिंगरौली के स्थानीय लोगों का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार और प्रशासन पूरी तरह से कॉर्पोरेट के दबाव में काम कर रहे हैं। जिस जमीन पर पीढ़ियों से आदिवासी और विभिन्न जातियों के लोग रहते आए हैं, उन्हें बिना उचित मुआवजे के हटाने की तैयारी है। सरकारी अधिकारी जनता की सुनने के बजाय कंपनी के ‘एजेंट‘ की भूमिका में नजर आ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार के लिए जनता की कीमत अडानी के मुनाफे से कम है?

हरे पेड़ों पर आरी, पर पौधारोपण सिर्फ कागजों में!

जमीन ही नहीं, सिंगरौली की आबोहवा पर भी प्रहार जारी है। प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों की संख्या में पुराने वृक्ष काटे जा रहे हैं। नियम कहते हैं कि जितने पेड़ कटेंगे, उससे कहीं ज्यादा लगाए जाएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि जहाँ घने जंगल थे, वहां अब सिर्फ धूल और धुँआ है। क्या सरकार को पर्यावरण की रत्ती भर परवाह है, या फिर ‘ग्रीन एनर्जी‘ के नाम पर सिर्फ जुमलेबाजी चल रही है?

जनता के चुभते सवाल: कौन चला रहा है सरकार?

आज सिंगरौली की गलियों में जनता तीखे सवाल पूछ रही है:

  • क्या देश के प्रधानमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री का चेहरा सिर्फ एक मुखौटा है और असली बागडोर अडानी के हाथों में है?
  • क्या सरकार की जवाबदेही जनता के प्रति खत्म होकर सिर्फ चुनिंदा उद्योगपतियों तक सिमट गई है?
  • क्या ‘सबका साथ, सबका विकास‘ का नारा सिर्फ एक चुनावी जुमला था, जो अब आदिवासियों की जमीन छीनने का हथियार बन गया है?

“सरकार की चुप्पी और प्रशासन की सख्ती यह साफ बयां करती है कि सत्ता के मन से जनता के प्रति सद्भावना पूरी तरह खत्म हो चुकी है। गरीब का घर उजाड़कर कॉर्पोरेट के महल खड़े करना क्या यही ‘रामराज्य‘ की परिकल्पना है?”

निष्कर्ष: जवाबदेही से भागती सरकार

अगर समय रहते विस्थापितों को उचित मुआवजा नहीं मिला और पर्यावरण की अनदेखी बंद नहीं हुई, तो सिंगरौली का यह आक्रोश एक बड़े जन-आंदोलन की शक्ल ले सकता है। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जनता के वोट से चुनी गई है, किसी कंपनी के निवेश से नहीं।

सिंगरौली। ऊर्जा धानी कहे जाने वाले सिंगरौली की धरती पर इस वक्त ‘विकास‘ के नाम पर विनाश का वो खेल चल रहा है, जिसकी चीखें शायद भोपाल और दिल्ली के गलियारों तक नहीं पहुँच रही हैं। आरोप है कि अडानी समूह के प्रोजेक्ट्स के लिए स्थानीय लोगों, विशेषकर गरीब आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, लेकिन मुआवजे के नाम पर उनके हाथ सिर्फ सन्नाटा है।

सत्ता का ‘अडानी प्रेम‘ या जनता से द्रोह?

सिंगरौली के स्थानीय लोगों का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार और प्रशासन पूरी तरह से कॉर्पोरेट के दबाव में काम कर रहे हैं। जिस जमीन पर पीढ़ियों से आदिवासी और विभिन्न जातियों के लोग रहते आए हैं, उन्हें बिना उचित मुआवजे के हटाने की तैयारी है। सरकारी अधिकारी जनता की सुनने के बजाय कंपनी के ‘एजेंट‘ की भूमिका में नजर आ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार के लिए जनता की कीमत अडानी के मुनाफे से कम है?

हरे पेड़ों पर आरी, पर पौधारोपण सिर्फ कागजों में!

जमीन ही नहीं, सिंगरौली की आबोहवा पर भी प्रहार जारी है। प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों की संख्या में पुराने वृक्ष काटे जा रहे हैं। नियम कहते हैं कि जितने पेड़ कटेंगे, उससे कहीं ज्यादा लगाए जाएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि जहाँ घने जंगल थे, वहां अब सिर्फ धूल और धुँआ है। क्या सरकार को पर्यावरण की रत्ती भर परवाह है, या फिर ‘ग्रीन एनर्जी‘ के नाम पर सिर्फ जुमलेबाजी चल रही है?

जनता के चुभते सवाल: कौन चला रहा है सरकार?

आज सिंगरौली की गलियों में जनता तीखे सवाल पूछ रही है:

  • क्या देश के प्रधानमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री का चेहरा सिर्फ एक मुखौटा है और असली बागडोर अडानी के हाथों में है?
  • क्या सरकार की जवाबदेही जनता के प्रति खत्म होकर सिर्फ चुनिंदा उद्योगपतियों तक सिमट गई है?
  • क्या ‘सबका साथ, सबका विकास‘ का नारा सिर्फ एक चुनावी जुमला था, जो अब आदिवासियों की जमीन छीनने का हथियार बन गया है?

“सरकार की चुप्पी और प्रशासन की सख्ती यह साफ बयां करती है कि सत्ता के मन से जनता के प्रति सद्भावना पूरी तरह खत्म हो चुकी है। गरीब का घर उजाड़कर कॉर्पोरेट के महल खड़े करना क्या यही ‘रामराज्य‘ की परिकल्पना है?”

निष्कर्ष: जवाबदेही से भागती सरकार

अगर समय रहते विस्थापितों को उचित मुआवजा नहीं मिला और पर्यावरण की अनदेखी बंद नहीं हुई, तो सिंगरौली का यह आक्रोश एक बड़े जन-आंदोलन की शक्ल ले सकता है। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जनता के वोट से चुनी गई है, किसी कंपनी के निवेश से नहीं।

  • gaurav singh rajput

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