नीतीश कुमार… इंजीनियर, सीएम से राज्यसभा तक की पूरी कहानी

नीतीश कुमार… ये सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें सोशल इंजीनयिरिंग का मास्टर कहा जाता है… वो बिहार के ऐसे नेता में शुमार रहे हैं, जिनके इर्द-गिर्द सत्ता का सिंहासन रहा है. वैसे तो साल 2000 में 7 दिनों के लिये पहली बार मुख्यमंत्री बने, पर 2005 के बाद जो सिलसिला शुरू हुआ वह 2026 तक चला है. गठबंधन किसी के साथ रहा हो, पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही आसीन होते रहे हैं. हालांकि बीच में 9 महीने के लिए जीतन राम मांझी भी सीएम बने थे.

साल 2005.. जब CM बने नीतीश कुमार

2005 नवंबर में जब दोबारा चुनाव हुआ तो नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और 5 साल तक रहे. 2010 में जब चुनाव हुआ तो प्रचंड जीत के साथ फिर से नीतीश मुख्यमंत्री बने. नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने से नाराज होकर 2013 में भाजपा से अलग हो गए.2014 में जब लोकसभा में जदयू का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, केवल दो सीट आयी तो उसके बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया. हालांकि नीतीश कुमार फिर से कुछ ही महीना में मुख्यमंत्री बन गए.

साल 2015.. लालू के साथ नीतीश

 2015 में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिला लिया और 2005 में जिस लालू प्रसाद और जदयू को सत्ता से बाहर किया था. एक बार फिर से जीवन दान दिया और प्रचंड जीत के साथ नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बने. तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया. लेकिन 2017 में नीतीश का मन लालू प्रसाद यादव से भर गया और फिर से उन्हें छोड़कर बीजेपी के साथ तालमेल कर लिए और फिर से मुख्यमंत्री बन गए.

साल 2020, BJP का साथ और CM बने

2020 के चुनाव में बीजेपी के साथ तालमेल से ही चुनाव लड़ा और फिर से मुख्यमंत्री बने. 2022 में नीतीश एक बार फिर से बीजेपी से दूरी बना लिए और राजद के साथ सरकार बना लिया और फिर मुख्यमंत्री बने. लेकिन 2024 में एक बार फिर से नीतीश ने राजद को छोड़ भाजपा के साथ तालमेल कर लिया और सरकार बना ली. 2025 में विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत मिली और फिर से मुख्यमंत्री बने लेकिन अब मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने वाले हैं.

एक इंजीनियर से राज्यसभा तक का सफर

नीतीश कुमार इंजीनियर हुआ करते थे. हालांकि उनके अंदर राजनेता की झलक बहुत पहले ही दिखने लगी थी. तभी तो जब जेपी आंदोलन हुआ तो वह सक्रिय रूप से कूद पड़े. इसके बाद उनके राजनीतिक जीवन को पंख लग गया. विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा से होते हुए राजनीति के अंतिम पड़ाव में वह राज्यसभा जा रहे हैं.

नीतीश कुमार.. चारों सदनों में पहुंचने वाले नेता 

नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन कर दिया है. अब इसके साथ ही नीतीश कुमार का नाम भी उन नेताओं की फेहरिस्त में शामिल हो जाएगा जो चारों सदन के सदस्य रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले विधानसभा, फिर लोकसभा, फिर बिहार विधान परिषद, अब राज्यसभा के लिए चुने जाएंगे. जाहिर सी बात है अब नीतीश कुमार का नाम उस फेहरिस्त में शामिल हो रहा है जिसमें चारों सदन के नेता शामिल हो चुके हैं. इससे पहले सुशील कुमार मोदी, नागमणि, रामकृपाल यादव, उपेंद्र कुशवाहा और लालू यादव शामिल थे. अब नीतीश कुमार भी इस फेहरिस्त में शामिल हो गए.

जेपी आंदोलन और नीतीश कुमार

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा में नामांकन के साथ ही जेपी आंदोलन से जुड़े बिहार के आखिरी व्यक्ति का शासन भी समाप्त होने जा रहा है. 1990 से लालू यादव ने जेपी एरा की शुरुआत की. उसके बाद से लेकर अब तक लालू यादव-नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द बिहार की राजनीति चली. लेकिन अब नीतीश कुमार के राज्यसभा के नामांकन के साथ ही 1974 के आंदोलनकारी जेपी आंदोलन में शामिल नेताओं का भी एरा समाप्त हो रहा है. जेपी आंदोलन के सदस्य रहे सुशील कुमार मोदी, लालू यादव, अश्वनी चौबे, संसदीय जीवन स्टॉप हो चुका है. जेपी के दौर के नीतीश कुमार और रविशंकर प्रसाद ही अभी पूरी तरह से संसदीय जीवन रहेंगे. कुल मिलाकर बिहार से जेपी युग की समाप्ति हो चुकी है.

लालू और नीतीश की दोस्ती

लालू यादव और नीतीश कुमार की राजनीति एक साथ ही शुरू हुई थी. दोनों जेपी आंदोलन की उपज रहे हैं. दोनों बिहार के मुख्यमंत्री भी बने. लालू जहां राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, वहीं नीतीश जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. अब दोनों 75 साल से अधिक उम्र के हो चुके हैं, लिहाजा सेहत दोनों के लिए समस्या बनती जा रही है.

हरनौत पहली बार विधानसभा के सदस्य बने

नीतीश कुमार 1985 में बिहार के हरनौत पहली बार विधानसभा के सदस्य बने. 1989 में पहली बार सांसद बनने वाले नीतीश कुमार 6 बार 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में भी लोकसभा के सदस्य चुने गए. पहली बार विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में 1990 में केंद्र में कृषि और सहकारिता राज्य मंत्री बने.

20 साल के कार्यकाल के बड़े फैसले

इसके बाद साल 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्र में रेल मंत्री और 2000 में फिर से केंद्र में कृषि मंत्री बनाए गए. 2001 में भी रेल मंत्री बने. उन्होंने 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर रिकॉर्ड बनाया है. साथ ही, उनके 20 साल के कार्यकाल में बिहार ने कई महत्वपूर्ण विकास देखे हैं, जिन्हें दशकों तक लोग याद रखेंगे.

जेपी आंदोलन के नेताओं का युग समाप्त

नीतीश कुमार के साथ ही बिहार का जेपी युग समाप्त हो रहा है. इससे पहले लालू प्रसाद यादव बिहार के राजनीति के केंद्र में रहे. उसके बाद नीतीश कुमार रहे और दोनों इत्तेफाक से जेपी आंदोलन से जुड़े रहे. पिछले 36 सालों में दोनों नेताओं ने बिहार की बागडोर अपने हाथ में ही रखी. ऐसे में नीतीश कुमार के राज्यसभा नामांकन के साथ जेपी आंदोलन से जुड़े नेताओं की बिहार की राजनीति समाप्त हो जाएगी.

 


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