
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समाज का निचला तबका इस महंगाई से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महंगाई पर नियंत्रण न पाया जाए और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सीमित रहें, तो समाज के एक बड़े हिस्से में आर्थिक असमानता और गरीबी का संकट गहराने का खतरा बढ़ जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम पर देश के प्रधानमंत्री की क्या प्रतिक्रिया और नीति रही है? प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार का रुख इस मामले पर हमेशा से देश के आंतरिक विनिर्माण को मजबूत करने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर रहा है। सरकार का तर्क है कि रुपये का गिरना केवल भारत की आंतरिक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक परिस्थिति है जहां दुनिया की कई बड़ी करेंसी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।
प्रधानमंत्री ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि भारत को अपने निर्यात को बढ़ावा देना होगा और विदेशी निवेश के लिए देश को एक आकर्षक बाजार बनाना होगा। सरकार का मानना है कि ‘मेक इन इंडिया’ और डिजिटल इकॉनमी जैसे कदम लंबी अवधि में रुपये को स्थिरता प्रदान करेंगे और वैश्विक झटकों से भारतीय बाजार की रक्षा करेंगे।
बहरहाल, अशोक गुलाटी जैसे नीतिगत सलाहकारों की चेतावनियां यह साफ करती हैं कि केवल दीर्घकालिक दावों से काम नहीं चलेगा, सरकार को तुरंत जमीनी स्तर पर कृषि, एमएसपी और ग्रामीण विकास से जुड़े ठोस फैसले लेने होंगे ताकि आम आदमी को इस आर्थिक मंदी की मार से बचाया जा सके।





