
राजू सिंह राठौड़ | बुरहानपुर| मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर बुरहानपुर स्थित श्री गोकुल चंद्रमाजी मंदिर में करीब 220 वर्ष पुरानी हस्तलिखित श्रीमद्भागवत महापुराण आज भी सुरक्षित रखी गई है। संस्कृत भाषा में लिखी यह दुर्लभ पांडुलिपि न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय संस्कृति और प्राचीन ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर भी मानी जाती है। खास बात यह है कि इस ग्रंथ की आज भी प्रतिदिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और भोग लगाया जाता है।
संवत 1862 की पांडुलिपि, 220 वर्ष पुरानी धरोहर
मंदिर में सुरक्षित यह श्रीमद्भागवत महापुराण लगभग 2 फीट लंबा है और इसे संस्कृत भाषा में पांडुलिपि शैली में लिखा गया है। ग्रंथ के अंतिम पृष्ठ पर संवत 1862 अंकित है। वर्तमान में संवत 2083 होने के आधार पर इसकी आयु लगभग 220 वर्ष मानी जाती है। यह पांडुलिपि भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है।
रोज होती है पूजा-अर्चना और भोग
मंदिर से जुड़े भागवत भूषण हरिकृष्ण मुखिया ने अपने जीवनकाल में 301 श्रीमद्भागवत कथाओं का वाचन किया था। वर्तमान में उनके पुत्र आदित्य मुखिया इस दुर्लभ ग्रंथ की सेवा और संरक्षण का दायित्व निभा रहे हैं। मंदिर में आज भी प्रतिदिन श्रीमद्भागवत की पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धापूर्वक भोग लगाया जाता है। मंदिर परिवार का मानना है कि श्रीमद्भागवत के प्रत्येक श्लोक और प्रत्येक शब्द में भगवान श्रीकृष्ण का वास है।
डिजिटल संरक्षण पर भी सरकार का जोर
भारत सरकार भी देश की प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए प्रयास कर रही है। ‘ज्ञान भारतम्’ डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से देशभर की दुर्लभ पांडुलिपियों का डिजिटल आर्काइव तैयार किया जा रहा है, ताकि शोधकर्ता और विद्यार्थी भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन कर सकें।
आस्था और विरासत का जीवंत प्रतीक
बुरहानपुर के श्री गोकुल चंद्रमाजी मंदिर में सुरक्षित यह 220 वर्ष पुरानी श्रीमद्भागवत आज भी श्रद्धा, सेवा और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक बनी हुई है। यह ग्रंथ धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, इतिहास और विरासत की अमूल्य धरोहर के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है।
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