
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र में एक बार फिर कार्यप्रणाली और अधिकारियों की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सूत्रों के अनुसार, कमिश्नर पद पर तैनात एक प्रमोटी आईपीएस अधिकारी जल्द ही रिटायर होने वाले हैं, लेकिन रिटायरमेंट से पहले उनके कार्यालय की गतिविधियों को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। दावा किया जा रहा है कि पिछले कुछ महीनों में विभागीय स्तर पर नोटिस जारी करने और उसके बाद मामलों को ‘मैनेज’ करने की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं।
जानकारी के मुताबिक, कई तहसीलदारों और स्थानीय अधिकारियों को लगातार नोटिस भेजे जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि नोटिस मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों पर जवाब और कार्रवाई का दबाव बनाया जाता है। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि कुछ मामलों में अधिकारियों को कमिश्नर कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जहां मामलों को शांत कराने के लिए अलग-अलग स्तर पर बातचीत होती है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सूत्र यह भी बताते हैं कि जिन जिलों में कलेक्टर अपेक्षाकृत सख्त कार्यशैली वाले हैं, वहां सीधे हस्तक्षेप आसान नहीं हो पाता, इसलिए अधीनस्थ अधिकारियों पर ज्यादा दबाव बनाया जाता है। चर्चा यह भी है कि कुछ अधिकारी इस पूरी प्रक्रिया को ‘वसूली अभियान’ की तरह देख रहे हैं, जबकि विभागीय स्तर पर इसे नियमित प्रशासनिक कार्रवाई बताया जा रहा है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर प्रदेश की नौकरशाही में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक नैतिकता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि सरकार या संबंधित कमिश्नर कार्यालय की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन यह मामला प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
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