
उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में इन दिनों एक पूर्व अपर मुख्य सचिव (ACS) चर्चा का विषय बने हुए हैं। नियमों को ताक पर रखकर यह अधिकारी रिटायरमेंट के एक साल बाद भी सरकारी बंगले पर कब्जा जमाए बैठे हैं। आम तौर पर सेवानिवृत्ति के कुछ महीनों के भीतर ही आवास खाली करने का नियम होता है, लेकिन यहां मामला पूरी तरह से अलग दिख रहा है। पूर्व अधिकारी अब भी उसी ‘नवाबी’ अंदाज में सरकारी संसाधनों का उपभोग कर रहे हैं, जैसे वे पद पर रहते हुए करते थे।
हैरानी की बात यह है कि संबंधित विभाग के आला अधिकारी इस मामले में पूरी तरह से मौन साधे हुए हैं। सूत्रों का कहना है कि पूर्व एसीएस का विभाग में अब भी इतना दबदबा है कि कोई भी अधिकारी उनसे बंगला खाली कराने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि नियमों का हवाला देने वाले विभाग आखिर एक रसूखदार व्यक्ति के सामने इतने बेबस क्यों नजर आ रहे हैं?
इस पूरे प्रकरण के पीछे एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि वर्तमान ब्यूरोक्रेसी में तैनात एक प्रभावशाली सीनियर आईएएस अधिकारी से पूर्व एसीएस की गहरी नजदीकी है। इसी ‘खास’ रसूख और संरक्षण के चलते अब तक न तो पूर्व अधिकारी को कोई नोटिस जारी किया गया है और न ही उन पर कोई दंडात्मक कार्रवाई की गई है।
यह मामला न केवल सरकारी नियमों के उल्लंघन का है, बल्कि उन प्रतीक्षारत अधिकारियों के हक का भी है जिन्हें पद मिलने के बाद भी आवास के लिए भटकना पड़ रहा है। रसूख और सांठगांठ के चलते सरकारी संपत्ति का इस तरह दुरुपयोग ब्यूरोक्रेसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
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