युवा IAS के टेंडर खेल की चर्चा, करोड़ों के ठेकों में ‘सेटिंग’ के आरोप

प्रदेश की नौकरशाही में एक युवा IAS अधिकारी इन दिनों बड़े सरकारी टेंडरों को लेकर चर्चाओं में हैं। करियर के शुरुआती वर्षों में ही उन्हें करोड़ों रुपये के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट से जुड़े पद पर तैनाती मिली, जिसे प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। बताया जाता है कि यह प्रोजेक्ट केंद्र की एक प्रमुख योजना से जुड़ा है और इसकी वित्तीय एवं तकनीकी महत्ता को देखते हुए सामान्यतः अनुभवी अधिकारियों को जिम्मेदारी दी जाती है। ऐसे में युवा अधिकारी की नियुक्ति ने शुरू से ही ध्यान खींचा।

सूत्रों के अनुसार, अधिकारी ने पदभार संभालने के तुरंत बाद ही टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में तेजी दिखाई। आरोप यह हैं कि टेंडर जारी होने से पहले कुछ प्रमुख शर्तों और तकनीकी मानकों में बदलाव किए गए, जिससे प्रतिस्पर्धा सीमित हो गई। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि अंतिम चरण में दो कंपनियां बचीं, जिनमें से एक अपेक्षाकृत नई मानी जा रही है। यही कंपनी आगे चलकर सफल बोलीदाता बनी, जिससे प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठे।

जानकारों का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया में तकनीकी अर्हताओं और अनुभव मानकों का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि नियमों में बदलाव से प्रतिस्पर्धा घटती है, तो पारदर्शिता और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इस मामले में भी यही आरोप लगाए जा रहे हैं कि बदलावों का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से परिणाम पर पड़ा। हालांकि आधिकारिक स्तर पर कोई अनियमितता सिद्ध नहीं हुई है और संबंधित विभाग ने प्रक्रिया को नियमसम्मत बताया है।

 

फिर भी, करोड़ों रुपये के इस प्रोजेक्ट में युवा IAS अधिकारी की भूमिका को लेकर नौकरशाही में बहस जारी है। एक पक्ष इसे तेज निर्णय क्षमता और कार्यान्वयन दक्षता का उदाहरण मान रहा है, तो दूसरा पक्ष अनुभव की कमी और प्रक्रिया की संवेदनशीलता का मुद्दा उठा रहा है। टेंडर आवंटन से जुड़ी ये चर्चाएं अब प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के व्यापक प्रश्नों को भी केंद्र में ला रही हैं।

  • gaurav singh rajput

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