नरवर किले की ऐतिहासिक तोपें बदहाल, कचहरी महल में कूड़े-घास के बीच पड़ी 26 धरोहरें

शिवपुरी/ रानू परिहार: मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक नरवर किले की पहचान केवल इसकी प्राचीन स्थापत्य कला और राजा नल से जुड़े इतिहास तक सीमित नहीं है। किले में मौजूद ऐतिहासिक तोपें भी इसके गौरवशाली अतीत की महत्वपूर्ण गवाह हैं। लेकिन वर्तमान में इन धरोहरों की हालत देखकर विरासत संरक्षण के दावों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। किले के कचहरी महल परिसर में ऑन रिकॉर्ड 26 ऐतिहासिक तोपें मौजूद बताई जाती हैं, जिन्हें पुरातत्व विभाग द्वारा नंबर भी दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद इनका रखरखाव बेहद खराब स्थिति में है।

कई तोपें घास और कूड़े-कचरे के बीच पड़ी दिखाई देती हैं। कुछ जमीन पर औंधी पड़ी हैं तो कुछ मिट्टी में धंसी हुई हैं। बरसात के मौसम में पानी और नमी के कारण इन पर जंग लगने का खतरा बना हुआ है। वहीं तेज धूप और खुले वातावरण में लगातार पड़े रहने से इनके संरक्षण पर गंभीर असर पड़ सकता है।

नंबरिंग हुई, लेकिन संरक्षण के इंतजाम गायब

स्थानीय लोगों के अनुसार पुरातत्व विभाग ने कुछ समय पहले इन तोपों का सर्वे कर उनकी नंबरिंग की थी। कई तोपों पर सफेद रंग से क्रमांक भी लिखे गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब इनकी पहचान और संख्या दर्ज की जा चुकी है, तो इनके संरक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?

कचहरी महल परिसर में रखी तोपों के लिए न तो पर्याप्त शेड नजर आता है और न ही ऐसा सुरक्षा घेरा, जिससे इन्हें नुकसान से बचाया जा सके। ऐतिहासिक महत्व की इन वस्तुओं के बारे में पर्यटकों को जानकारी देने के लिए सूचना पटल की व्यवस्था भी दिखाई नहीं देती।

स्थानीय इतिहास प्रेमियों का कहना है कि सिर्फ नंबर लिख देना किसी ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण नहीं है। जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक तोप का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन कर उसकी उम्र, धातु, निर्माण तकनीक और ऐतिहासिक उपयोग का रिकॉर्ड तैयार किया जाए।

26 से ज्यादा तोपें होने का दावा

सरकारी रिकॉर्ड में जहां 26 तोपों का उल्लेख बताया जा रहा है, वहीं स्थानीय इतिहासकारों और लोगों का दावा है कि नरवर किले में इनसे अधिक तोपें भी अलग-अलग स्थानों पर मौजूद हो सकती हैं। किले के बुर्जों, कोनों और अन्य हिस्सों में बिखरी पड़ी ऐतिहासिक तोपों की पूरी सूची तैयार किए जाने की जरूरत है।

किले में मौजूद तोपों का आकार भी अलग-अलग बताया जाता है। कुछ छोटी तोपें हैं, जबकि कुछ बड़ी तोपें कई फीट लंबी हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक कुछ तोपों पर पुरानी कारीगरी और लिखावट के निशान भी दिखाई देते हैं। इनमें उर्दू-फारसी भाषा से जुड़े अवशेष होने की बात कही जाती है। हालांकि इनका प्रमाणिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण होना अभी बाकी है।

राजा नल की नगरी नरवर का गौरवशाली इतिहास

नरवर का इतिहास बेहद प्राचीन और समृद्ध माना जाता है। इसे राजा नल की नगरी के रूप में भी जाना जाता है। बाद के दौर में कछवाहा, तोमर और सिंधिया शासकों का भी इस क्षेत्र से संबंध रहा। नरवर किला सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित होने के कारण लंबे समय तक सत्ता और सुरक्षा का प्रमुख केंद्र रहा।

किले की मजबूत संरचना, ऊंचे बुर्ज और रणनीतिक स्थिति इसे एक महत्वपूर्ण दुर्ग बनाते हैं। ऐसे में यहां मौजूद तोपें केवल धातु से बनी वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि उस दौर की सैन्य व्यवस्था, तकनीक और युद्ध प्रणाली को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।

कभी इन तोपों की गर्जना दुश्मन सेनाओं के लिए चुनौती मानी जाती होगी। आज स्थिति यह है कि वही तोपें खुले में पड़ी अपने संरक्षण की बाट जोह रही हैं।

कचहरी महल में बदहाली पर उठ रहे सवाल

कचहरी महल नरवर किले के महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है। इसी परिसर में कई ऐतिहासिक तोपों को एक जगह रखा गया है। लेकिन साफ-सफाई और संरक्षण की उचित व्यवस्था नहीं होने से पूरा परिसर उपेक्षा की तस्वीर पेश करता है।

घास के बीच पड़ी तोपों को देखकर पर्यटकों को उनके वास्तविक इतिहास और महत्व की जानकारी नहीं मिल पाती। यदि इन्हें व्यवस्थित तरीके से प्रदर्शित किया जाए तो यह स्थान नरवर आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बन सकता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार और पर्यटन विभाग की ओर से विरासत पर्यटन को बढ़ावा देने की बातें लगातार की जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐतिहासिक धरोहरों की स्थिति अलग कहानी बयां कर रही है।

ओपन एयर म्यूजियम बनाने की मांग

इतिहास प्रेमियों और स्थानीय युवाओं ने मांग की है कि कचहरी महल परिसर में इन तोपों के लिए ओपन एयर म्यूजियम या तोपखाना गैलरी विकसित की जाए। सभी तोपों को वैज्ञानिक तरीके से साफ कर सुरक्षित शेड में रखा जाए और उनके आसपास सुरक्षा घेरा बनाया जाए।

प्रत्येक तोप के सामने हिंदी और अंग्रेजी में उसका इतिहास, अनुमानित काल, निर्माण सामग्री, उपयोग और सैन्य महत्व जैसी जानकारी प्रदर्शित की जा सकती है। इससे पर्यटकों को नरवर के इतिहास को समझने में मदद मिलेगी और स्थानीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है।

प्रशासन से संरक्षण की उम्मीद

स्थानीय इतिहास प्रेमियों ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, शिवपुरी जिला प्रशासन, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और संस्कृति विभाग से इन धरोहरों के संरक्षण की मांग की है।

लोगों का कहना है कि सबसे पहले नरवर किले में मौजूद सभी तोपों का दोबारा सर्वे कराया जाए। उनकी सूची तैयार कर वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाए और यह पता लगाया जाए कि कौन-सी तोप किस काल की है। इसके बाद संरक्षण विशेषज्ञों की निगरानी में इन्हें सुरक्षित स्थान पर रखा जाए।

नरवर की ये ऐतिहासिक तोपें सिर्फ लोहे के टुकड़े नहीं हैं। ये उस दौर की सैन्य शक्ति, तकनीक और राजशाही के इतिहास की जीवंत निशानियां हैं। अगर समय रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया तो मौसम, जंग और लगातार उपेक्षा इनके अस्तित्व को नुकसान पहुंचा सकती है।

अब सवाल यही है कि जिन तोपों ने कभी नरवर की सुरक्षा में भूमिका निभाई, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर कौन उठाएगा? प्रशासन और पुरातत्व विभाग की ओर से ठोस पहल का इंतजार स्थानीय लोगों को लंबे समय से है।

यह भी पढ़े: आधुनिक भारत के शिल्पकार राजीव गांधी: दूरदर्शी फैसलों ने रखी 21वीं सदी के भारत की नींव

 

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  • Manisha Gupta

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