पेट्रोल की कीमतों का बड़ा खेल, कच्चा तेल हुआ सस्ता, फिर भी जनता पर क्यों बढ़ रहा है महंगाई का बोझ?

आज हम देश के हर नागरिक से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर बात करने जा रहे हैं—वह मुद्दा है पेट्रोल की बढ़ती कीमतें। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब कच्चा तेल यानी क्रूड ऑयल सस्ता होता है, तो देश में पेट्रोल के दाम कम क्यों नहीं होते? आज ब्रांडवाणी समाचार आपको इसके पीछे के पूरे गणित और सच्चाई से रूबरू कराएगा।

कच्चा तेल सस्ता, पेट्रोल महंगा क्यों? वर्ष 2014 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल (कच्चा तेल) की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल थी, और तब हमारे देश में पेट्रोल लगभग 72 रुपये प्रति लीटर की दर से बिकता था। लेकिन आज के समय में वही क्रूड ऑयल घटकर लगभग 96 डॉलर प्रति बैरल पर आ चुका है। यानी पेट्रोल बनाने का कच्चा माल पहले से काफी सस्ता हो चुका है। इसके बावजूद, आज देश के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली में पेट्रोल 102 रुपये और मुंबई में 111 रुपये प्रति लीटर के पार बिक रहा है। कच्चा माल सस्ता होने के बाद भी तैयार उत्पाद का इतना महंगा होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) का गणित इस पूरी कहानी के पीछे सरकार द्वारा लगाई जाने वाली एक्साइज ड्यूटी का एक बड़ा खेल है। वर्ष 2014 से पहले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी मात्र 9.48 रुपये प्रति लीटर हुआ करती थी। लेकिन उसके बाद जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें गिरीं, सरकार ने उसका सीधा फायदा जनता को देने के बजाय एक्साइज ड्यूटी में बढ़ोतरी करना शुरू कर दिया, जिसे बढ़ाकर 11 रुपये प्रति लीटर तक कर दिया गया।

आपदा में अवसर या जनता पर बोझ? साल 2020 में जब कोरोना महामारी आई, तब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में 69 प्रतिशत तक की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई थी। नियम के अनुसार, देश की जनता को पेट्रोल पर भारी छूट मिलनी चाहिए थी। यदि सरकार उस समय अतिरिक्त टैक्स न लगाती, तो देशवासियों को पेट्रोल मात्र 40 रुपये प्रति लीटर की दर से मिल सकता था। परंतु, मई 2020 में एक्साइज ड्यूटी को 10 रुपये प्रति लीटर और बढ़ा दिया गया, जिससे यह शुल्क बढ़कर 32 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया। सस्ते कच्चे तेल का पूरा लाभ जनता को देने के बजाय टैक्स के रूप में वसूल लिया गया।

युद्ध का बहाना और इथेनॉल का मिश्रण साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं, तो उसका बोझ तुरंत जनता पर डालते हुए पेट्रोल के दाम 5 से 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिए गए। लेकिन ठीक अगले ही वर्ष 2023 में जब कच्चे तेल की कीमतें पुनः नीचे आईं, तब आम जनता को दामों में कोई कटौती या राहत नहीं दी गई।

इसके अतिरिक्त, एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आज जो पेट्रोल देश में मिल रहा है, वह शत-प्रतिशत शुद्ध पेट्रोल नहीं है। इसमें लगभग 20 प्रतिशत तक ‘इथेनॉल’ मिलाया जा रहा है। इथेनॉल की थोक कीमत (होलसेल प्राइस) मात्र 60 से 65 रुपये प्रति लीटर होती है, जो कि सामान्य पेट्रोल से काफी सस्ती है। इथेनॉल मिलाने के कारण पेट्रोल की लागत स्वतः ही कम हो जाती है, परंतु इस कटौती का लाभ भी आम उपभोक्ताओं की जेब तक नहीं पहुंच पा रहा है।

साफ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में संकट आते ही सारा आर्थिक बोझ आम जनता के सिर मढ़ दिया जाता है, और जब कीमतें कम होने के अच्छे दिन आते हैं, तो उसका मुनाफा टैक्स के रूप में रख लिया जाता है।

ब्रांडवाणी समाचार के इस विशेष बुलेटिन में आज के लिए बस इतना ही। देश और दुनिया की तमाम निष्पक्ष और सटीक खबरों के लिए बने रहिए हमारे साथ।

 

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gaurav singh rajput

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