
ईरान से जुड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का असर अब भारतीय संसद में भी देखने को मिल रहा है। इस मुद्दे को लेकर संसद के दोनों सदनों में सोमवार को तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन गई। विपक्षी दलों ने सरकार से स्पष्ट बयान देने की मांग करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव का भारत की विदेश नीति और सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, इस पर संसद में खुलकर चर्चा होनी चाहिए।
विपक्ष का कहना था कि ऐसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को संसद को विश्वास में लेना चाहिए। कई विपक्षी सांसदों ने कार्यवाही के दौरान नारेबाजी करते हुए सदन में चर्चा की मांग उठाई। इस वजह से कुछ समय के लिए सदन की कार्यवाही भी प्रभावित हुई और माहौल काफी गरम हो गया।
विपक्ष की मांग: विदेश नीति पर संसद में चर्चा जरूरी
विपक्षी नेताओं का तर्क था कि ईरान से जुड़े हालात सिर्फ एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं हैं, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक राजनीति और आर्थिक हालात पर भी पड़ सकता है। ऐसे में भारत की रणनीति क्या होगी, यह देश की जनता को भी पता होना चाहिए। विपक्ष ने कहा कि संसद लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच है और यहां पर इस तरह के मुद्दों पर गंभीर चर्चा होना जरूरी है।
कुछ सांसदों ने यह भी कहा कि यदि सरकार के पास इस विषय पर स्पष्ट नीति है तो उसे सदन के सामने रखा जाना चाहिए। उनका मानना था कि विदेश नीति से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और संवाद लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करते हैं।
सरकार का जवाब: प्रस्ताव पर बहस से पीछे नहीं हटेंगे
विपक्ष के हंगामे के बीच सरकार की ओर से भी जवाब दिया गया। सरकार ने कहा कि वह संसदीय नियमों के तहत हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि स्पीकर को हटाने से जुड़े प्रस्ताव पर बहस करनी है तो सरकार उससे भी पीछे नहीं हटेगी।
सरकार के इस बयान के बाद कुछ समय तक सदन में राजनीतिक बहस और तेज हो गई। हालांकि संसदीय कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के लिए स्पीकर और सदन के वरिष्ठ नेताओं ने सभी पक्षों से सहयोग की अपील भी की।
राजनीतिक माहौल में बढ़ी तल्खी
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर संसद के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती राजनीतिक तल्खी को सामने ला दिया है। अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर अक्सर घरेलू राजनीति में भी दिखाई देता है और ईरान से जुड़े हालात को लेकर संसद में हुआ यह टकराव उसी का एक उदाहरण माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद के भीतर और बाहर बहस जारी रह सकती है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि सरकार इस अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति पर भारत की रणनीति को किस तरह स्पष्ट करती है।









