
देश के अन्नदाता और आम जनता के पेट की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिस एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) पर है, उसके भीतर इन दिनों ‘आधुनिकीकरण’ के नाम पर जो खिचड़ी पक रही है, उसकी महक अब सीधे सत्ता के गलियारों से होते हुए कारपोरेट घरानों की तिजोरियों तक जा रही है। देश में अनाज के भंडारण के लिए नए और आधुनिक ‘स्टील साइलोज’ (Steel Silos) वेयरहाउस बनाने के लिए 134 टेंडर निकाले गए। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 110 टेंडर अकेले एक ही उद्योगपति—अडानी समूह—की झोली में डाल दिए गए।

यह महज़ एक व्यावसायिक सौदा नहीं है, बल्कि नियमों की बलि देकर तैयार की गई एक ऐसी बिसात है, जिसने देश के मध्यवर्ग और गरीबों को कॉर्पोरेट गुलामी के नए चक्रव्यूह में धकेल दिया है।इस पूरे खेल की क्रोनोलॉजी को समझना बेहद जरूरी है। शुरुआत में इस टेंडर प्रक्रिया में एक बेहद महत्वपूर्ण और लोकतांत्रिक नियम शामिल था—’एंटी-मोनोपॉली क्लॉज’ (Anti-Monopoly Clause)। इस नियम का साफ मतलब था कि:
किसी भी एक व्यक्ति या कंपनी को सारा काम नहीं दिया जाएगा।बाजार में किसी एक की मोनोपोली (एकाधिकार) स्थापित न हो।देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग स्थानीय और योग्य बिडर्स को काम का मौका मिले।लेकिन, मई 2022 में पीपीपीएसी (PPPAC – Public Private Partnership Appraisal Committee) की एक हाई-प्रोफाइल बैठक होती है। इस बैठक में ‘नीति आयोग’ और ‘आर्थिक मामलों के विभाग’ (Department of Economic Affairs) के आला अधिकारी शामिल होते हैं। सूत्रों और रणनीतियों के मुताबिक, इस बैठक में इस ‘एंटी-मोनोपॉली’ क्लॉज को ही जड़ से उखाड़ फेंका गया।आखिर इसके पीछे ‘साहब’ की क्या मंसा थी?

देश भर में 80 जगहों पर होने वाले इस 11,915 करोड़ रुपये के सिंगल टेंडर में मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य शामिल थे। हैरानी की बात तो यह है कि रेस में कई जगहों पर जो समूह पहले और दूसरे नंबर पर (First & Second Bidder) भी नहीं था, उसे ये टेंडर कैसे मिल गए? इसका जवाब देश की जनता बखूबी समझती है।
अब बात करते हैं देश की उस मूक जनता की, जो इस पूरे खेल में सिर्फ मोहरा बनकर रह गई है। ब्रांडवाणी समाचार सीधे जनता के सरोकार से जुड़े ये कड़े सवाल उठा रहा है:
अपर मिडिल क्लास और हाई क्लास की चुप्पी: क्या देश का पढ़ा-लिखा उच्च और मध्यम-उच्च वर्ग पूरी तरह से सत्ता और कॉर्पोरेट के गठजोड़ के आगे घुटने टेक चुका है? क्या वे इस व्यवस्था के अनकहे गुलाम बन चुके हैं, जिन्हें हर महीने मिलने वाली सैलरी और टैक्स की मार के अलावा देश के संसाधनों की लूट से कोई सरोकार नहीं रह गया है?
टूटता हुआ मध्यम वर्ग: देश का रीढ़ कहा जाने वाला मध्यम वर्गीय परिवार आज अंदर से पूरी तरह टूट चुका है। एक तरफ महंगाई की मार है, तो दूसरी तरफ मुट्ठी भर कॉर्पोरेट्स के हाथों में सिमटते देश के संसाधन। जब अनाज जैसी बुनियादी चीज पर भी किसी एक समूह का नियंत्रण होगा, तो मध्यम वर्ग की जेब पर डाका पड़ना तय है।
उलझता हुआ गरीब: सरकार राशन मुफ्त देने का दावा तो करती है, लेकिन जिस अनाज को रखने की व्यवस्था (साइलोज) ही निजी हाथों में सौंप दी गई हो, वहां गरीब आदमी सिर्फ और सिर्फ सत्ता की बैसाखियों और कॉर्पोरेट की शर्तों के बीच उलझकर दम तोड़ने को मजबूर है।यह सिर्फ एक टेंडर का मामला नहीं है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा (Food Security) की चाबी को एक ही लॉकर में बंद करने की साज़िश है। जब नियम बदले जाते हैं, जब ‘एंटी-मोनोपॉली’ जैसे सुरक्षा कवच को नीति आयोग खुद हटा देता है, तो साफ है कि नीतियां अब जनता के हित में नहीं, बल्कि ‘मित्रों’ के मुनाफे के लिए बनाई जा रही हैं।जनता टैक्स दे रही है, किसान अनाज उगा रहा है, लेकिन मलाईदार आधुनिक वेयरहाउस की चाबी किसी और के पास है।
क्या यह नया भारत है, या फिर कॉर्पोरेट राज का नया आगाज़? जनता को अब जागना होगा, क्योंकि अगर आज सवाल नहीं पूछे, तो कल आपके थाली की रोटी की कीमत भी कोई एक उद्योगपति अपने केबिन में बैठकर तय करेगा।








