
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां बांग्लादेश ने भारत से जुड़े एक महत्वपूर्ण स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) परियोजना को समाप्त कर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, इस परियोजना की जमीन अब चीन को सौंप दी गई है, जहां ड्रोन निर्माण से जुड़ी फैक्ट्री स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। इस फैसले को भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि यह केवल आर्थिक सहयोग नहीं बल्कि रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करता है।
सूत्रों के मुताबिक, बांग्लादेश और चीन के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। इसी क्रम में बांग्लादेश को जल्द ही 20 चीनी फाइटर जेट मिलने की संभावना जताई जा रही है, जिससे उसकी सैन्य क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा चीन की दक्षिण एशिया में सैन्य और तकनीकी मौजूदगी को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है, जो भारत और अमेरिका जैसे देशों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बांग्लादेश का यह कदम उसकी विदेश नीति में बदलाव का संकेत देता है। भारत के साथ आर्थिक परियोजनाओं को सीमित करना और चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाना यह दर्शाता है कि ढाका अपनी कूटनीति में नए विकल्प तलाश रहा है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय आर्थिक लाभ, निवेश और तकनीकी सहयोग की जरूरतों से भी जुड़ा हो सकता है, न कि केवल राजनीतिक कारणों से।
इस घटनाक्रम के बाद दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है। भारत, चीन और बांग्लादेश के बीच त्रिकोणीय संबंधों में बदलाव से न केवल आर्थिक बल्कि सुरक्षा नीति पर भी असर पड़ेगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस नई रणनीतिक स्थिति का सामना किस तरह करता है और क्षेत्रीय संतुलन कैसे विकसित होता है।









