
दतिया/कुलदीप शर्मा की रिपोर्ट: रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह का पर्व नहीं, बल्कि रक्षा, विश्वास, कर्तव्य और मर्यादा के पवित्र संकल्प का भी उत्सव है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु अपने आराध्य देवी-देवताओं और सद्गुरु को रक्षासूत्र समर्पित कर उनके प्रति अपनी श्रद्धा और आस्था व्यक्त करते हैं। इसी क्रम में परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री गुरुशरण जी महाराज (पंडोखर सरकार) की पावन कलाई पर एक शिष्य के रूप में रक्षासूत्र बांधने का अवसर प्राप्त हुआ। इस अवसर को श्रद्धा और भावनाओं से भरा विशेष क्षण बताया गया। इस दौरान रक्षासूत्र के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया कि यह केवल एक धागा नहीं, बल्कि विश्वास और ईश्वरीय आशीर्वाद का प्रतीक है। मान्यता है कि रक्षासूत्र व्यक्ति को हर संकट से बचाने वाले विश्वास और सुरक्षा के भाव से जोड़ता है।
गुरु को रक्षासूत्र बांधने का क्या है अर्थ?
सामान्यतः गुरु ही अपने शिष्य की रक्षा करते हैं और उसे अज्ञान से ज्ञान की ओर, भ्रम से सत्य की ओर तथा विपत्ति से सद्मार्ग की ओर ले जाते हैं। ऐसे में गुरु को रक्षासूत्र बांधने का अर्थ गुरु की रक्षा करने का दावा नहीं, बल्कि उनके बताए मार्ग, गुरुवाणी, संस्कारों और मर्यादाओं के प्रति स्वयं को समर्पित करने का संकल्प है। गुरु की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर शिष्य मानो यह प्रतिज्ञा करता है कि वह गुरुदेव द्वारा दिए गए सिद्धांतों, संस्कारों, मर्यादाओं और सेवा-पथ के प्रति सदैव निष्ठावान रहेगा।
“गुरुदेव! रक्षा तो सदैव आप ही हमारी करते आए हैं। आज यह रक्षासूत्र आपकी कलाई पर बांधकर मैं संकल्प करता हूं कि आपके दिए संस्कारों, सिद्धांतों, मर्यादाओं और सेवा-पथ के प्रति सदैव निष्ठावान रहूंगा।” गुरु और शिष्य का संबंध सांसारिक स्वार्थ से नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास, अनुशासन और आत्मिक समर्पण से निर्मित होता है। गुरु की कलाई पर बंधा रक्षासूत्र वास्तव में शिष्य को जीवनभर अपने कर्तव्य, गुरुनिष्ठा और धर्ममार्ग का स्मरण कराता है। इस पावन अवसर पर प्रार्थना की गई कि पूज्य गुरुदेव श्री गुरुशरण जी महाराज की कृपा और आशीर्वाद सभी श्रद्धालुओं पर बना रहे तथा सभी उनके बताए धर्म, सेवा और मानव कल्याण के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते रहें।
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