सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी घटाई तो 9% तक सस्ता हो सकता है Gold: सोने के दाम में आ सकती है बड़ी गिरावट

सार:

भारत में सोने की कीमतों को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। सरकार अगर सोने पर बढ़ी हुई इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती करती है, तो घरेलू बाजार में इसकी कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिल सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक ड्यूटी में कटौती होने पर सोने के दाम करीब 9 प्रतिशत तक नीचे आ सकते हैं। हालांकि फिलहाल यह संभावित नीति बदलाव है, कोई अंतिम फैसला नहीं।

विस्तार:

सोना खरीदने वालों के लिए आने वाले दिनों में बाजार से बड़ी राहत की खबर सामने आ सकती है। भारत में सोने की कीमतें लंबे समय से ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और ऐसे में अगर सरकार आयात शुल्क में कटौती करती है तो घरेलू बाजार में सोने के दाम पर सीधा असर पड़ सकता है। सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, इंपोर्ट ड्यूटी घटाए जाने की स्थिति में सोने की कीमतों में करीब 9 प्रतिशत तक की कमी आने की संभावना जताई जा रही है।

हालांकि यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह फिलहाल संभावित बदलाव से जुड़ी खबर है। सरकार ने सोने की इंपोर्ट ड्यूटी घटाने का अंतिम फैसला घोषित नहीं किया है। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि सोना निश्चित रूप से 9 प्रतिशत सस्ता होने जा रहा है। कीमत में वास्तविक गिरावट कितनी होगी, यह ड्यूटी में होने वाली कटौती, अंतरराष्ट्रीय बाजार और रुपये की स्थिति समेत कई कारकों पर निर्भर करेगी।

सोने की कीमत भारत में सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार से तय नहीं होती। इसके ऊपर आयात शुल्क, टैक्स, रुपये और डॉलर की चाल तथा घरेलू मांग जैसे कई कारकों का असर पड़ता है। ऐसे में सरकार की टैक्स नीति में बदलाव होने पर इसका प्रभाव बाजार में दिखाई देना स्वाभाविक है।

भारत अपनी सोने की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। देश में सोने का घरेलू उत्पादन सीमित है, जबकि आभूषण और निवेश के लिए इसकी मांग काफी ज्यादा रहती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ-साथ भारत में लागू आयात शुल्क भी घरेलू सोने की कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जब सरकार सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाती है, तो विदेश से भारत में सोना लाने की लागत बढ़ जाती है। इसका असर आगे घरेलू बाजार की कीमत पर पड़ सकता है। इसके उलट यदि आयात शुल्क में कटौती होती है, तो आयात की लागत कम होने से बाजार में कीमत घटने की संभावना बनती है।

इसी कारण सोने के खरीदारों की नजर सरकार की आयात शुल्क नीति पर रहती है।

सोने की मौजूदा कीमतों और आयात नीति को समझने के लिए 2026 में हुए बदलाव को देखना जरूरी है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, भारत ने 2026 में सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत किया था। यह बदलाव सोने के आयात को नियंत्रित करने के उद्देश्य से उठाए गए कदमों की श्रृंखला का हिस्सा था।

इस बढ़ोतरी ने सोने के आयात की लागत को काफी प्रभावित किया। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने अनुमान लगाया था कि बढ़ी हुई ड्यूटी के कारण भारत में ज्वेलरी, बार और सिक्कों की मांग में लगभग 50 से 60 टन, यानी करीब 10 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।

ऐसे में अब अगर सरकार आयात शुल्क को फिर कम करने का फैसला करती है, तो बाजार में इसका उलटा प्रभाव देखने को मिल सकता है।

मान लीजिए सरकार सोने पर लगने वाली आयात ड्यूटी में बड़ी कटौती करती है। ऐसी स्थिति में विदेश से सोना खरीदकर भारत लाने की लागत कम होगी।

आयात लागत कम होने से घरेलू बाजार में सोने की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। ज्वेलर्स के लिए सोने की खरीद अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती है और इसका फायदा आगे ग्राहकों तक पहुंचने की संभावना रहती है।

हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत उसी समय बढ़ रही हो तो घरेलू बाजार में ड्यूटी कटौती का पूरा फायदा दिखाई नहीं दे सकता। इसी तरह यदि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो आयात सस्ता होने का प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकता है।

इसलिए ड्यूटी में कटौती का मतलब यह नहीं है कि अगले ही दिन बाजार में सोना बिल्कुल 9 प्रतिशत सस्ता हो जाएगा।

रिपोर्ट में इंपोर्ट ड्यूटी में संभावित बदलाव को सोने की कीमतों में करीब 9 प्रतिशत तक की कमी से जोड़कर देखा गया है। इसका आधार मौजूदा ड्यूटी संरचना और घरेलू कीमत पर आयात लागत के प्रभाव से जुड़ा है।

अगर सरकार उस स्तर तक शुल्क कम करती है जिससे आयात लागत में उल्लेखनीय कमी आती है, तो सोने के घरेलू दाम में भी बड़ा अंतर आ सकता है।

लेकिन यहां एक बात महत्वपूर्ण है- 9 प्रतिशत गिरावट एक संभावित अनुमान है, कोई गारंटीड कीमत कटौती नहीं।

सोने का अंतरराष्ट्रीय भाव हर दिन बदलता है। इसके अलावा भारतीय रुपया, वैश्विक ब्याज दरें, केंद्रीय बैंकों की खरीद, भू-राजनीतिक तनाव और निवेशकों की सुरक्षित निवेश की मांग भी सोने की कीमत को प्रभावित करती है।

कई बार लोग मान लेते हैं कि भारत में सोने का भाव सरकार तय करती है, लेकिन ऐसा नहीं है। सरकार टैक्स और आयात शुल्क के जरिए इसकी घरेलू लागत को प्रभावित करती है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव अलग कारकों से तय होता है। दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक अक्सर सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में देखते हैं। इससे मांग बढ़ सकती है और अंतरराष्ट्रीय कीमत ऊपर जा सकती है।

इसके अलावा अमेरिकी ब्याज दरों और डॉलर की स्थिति का भी सोने पर प्रभाव पड़ता है।

भारत में इसके ऊपर रुपये की विनिमय दर और आयात से जुड़े शुल्क जुड़ते हैं। इसलिए घरेलू कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार और घरेलू नीतियों दोनों के मेल से बनती है।

भारत के लिए सोने का आयात सिर्फ उपभोक्ताओं की मांग का विषय नहीं है। यह देश के व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा पर भी प्रभाव डालता है।

रॉयटर्स के अनुसार, 2025 में भारत का सोने का आयात 58.9 अरब डॉलर रहा था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.6 प्रतिशत अधिक था। उसी साल चांदी का आयात भी बढ़ा था।

सोना भारत के प्रमुख आयातित उत्पादों में शामिल है। इसलिए जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं और घरेलू मांग मजबूत रहती है, तो सोने के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा भी बढ़ सकती है।

यही कारण है कि सरकार कभी-कभी आयात को नियंत्रित करने के लिए शुल्क और दूसरे नियामकीय कदमों का इस्तेमाल करती है।

मौजूदा समय में सोने की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं। ऐसे में त्योहारों और शादी के सीजन से पहले कीमत में संभावित राहत ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

भारत में सोना सिर्फ निवेश का माध्यम नहीं है। बड़ी संख्या में परिवार शादी-ब्याह और धार्मिक अवसरों पर आभूषण खरीदते हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों बाजारों में सोने की मांग बनी रहती है।

अगर आयात शुल्क में कटौती होती है और इसका असर खुदरा बाजार तक पहुंचता है, तो ज्वेलरी खरीदने वाले ग्राहकों को कुछ राहत मिल सकती है।

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हालांकि इसका फायदा ग्राहकों तक कितनी तेजी से पहुंचता है, यह ज्वेलर्स की खरीद लागत, बाजार की मांग और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भी निर्भर करेगा।

अगर आप सोने के आभूषण खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो केवल सोने के भाव को देखना पर्याप्त नहीं है। ज्वेलरी की अंतिम कीमत में मेकिंग चार्ज, टैक्स और अन्य लागत भी शामिल होती हैं।

इसलिए अगर सोने की मूल कीमत में गिरावट आती है, तो आभूषण की अंतिम कीमत में भी राहत मिल सकती है, लेकिन दोनों में बिल्कुल समान प्रतिशत की कमी जरूरी नहीं है।

उदाहरण के तौर पर यदि सोने की कीमत 9 प्रतिशत नीचे जाती है, तो इसका यह मतलब नहीं कि हर आभूषण 9 प्रतिशत सस्ता हो जाएगा। डिजाइन, मेकिंग चार्ज और अन्य लागत के कारण अंतिम कीमत अलग हो सकती है।

सोने में निवेश करने वाले लोगों के लिए संभावित ड्यूटी कटौती एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो सकता है। अगर सरकार आयात शुल्क घटाती है और घरेलू कीमतों में गिरावट आती है, तो ऊंचे भाव पर सोना खरीदने वाले निवेशकों को अल्पावधि में नुकसान का जोखिम हो सकता है।

वहीं जिन लोगों ने अभी तक सोना नहीं खरीदा है, उनके लिए कीमत में गिरावट खरीदारी का अवसर बन सकती है।

हालांकि निवेश का फैसला केवल संभावित सरकारी नीति पर आधारित नहीं होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की दिशा और व्यक्ति की निवेश अवधि भी महत्वपूर्ण होती है।

भारत में सोने की आयात ड्यूटी में बदलाव पहले भी घरेलू बाजार को प्रभावित करता रहा है। 2024 के बजट में सोने पर आयात शुल्क को 15 प्रतिशत से घटाकर 6 प्रतिशत किया गया था। उस समय इस कदम से घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई थी।

2026 में स्थिति इसके उलट रही, जब ड्यूटी को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत किया गया। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने इसे अब तक की सबसे बड़ी एकमुश्त बढ़ोतरी बताया।

यही पिछला अनुभव इस बात को समझने में मदद करता है कि आयात शुल्क में बदलाव सोने के घरेलू बाजार को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

आयात शुल्क घटाने का फायदा ग्राहकों और ज्वेलर्स को मिल सकता है, लेकिन सरकार के लिए इसका दूसरा पहलू भी है। शुल्क कम होने का मतलब आयात पर मिलने वाले राजस्व में कमी हो सकती है।

सरकार को एक तरफ उपभोक्ताओं को महंगे सोने से राहत देने और दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा तथा आयात पर नियंत्रण के बीच संतुलन बनाना होगा।

अगर ड्यूटी बहुत ज्यादा रखी जाती है तो आयात महंगा होता है और मांग प्रभावित हो सकती है। वहीं बहुत ज्यादा कटौती से सोने की मांग और आयात फिर बढ़ सकते हैं।

इसीलिए सरकार के लिए आयात शुल्क तय करना सिर्फ कीमत घटाने या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था से जुड़े कई पहलुओं का संतुलन भी है।

संभावित ड्यूटी कटौती की खबर के बाद बहुत से ग्राहकों के मन में यह सवाल आ सकता है कि अभी सोना खरीदें या कीमत गिरने का इंतजार करें।

इसका कोई एक जवाब नहीं है। यदि खरीदारी शादी या किसी जरूरी अवसर के लिए है, तो सिर्फ अनुमान के आधार पर फैसला लेना जोखिम भरा हो सकता है।

वहीं निवेश के उद्देश्य से खरीदारी करने वाले लोगों को बाजार की अस्थिरता और सरकारी नीति दोनों पर नजर रखनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार की ओर से अंतिम घोषणा आने तक 9 प्रतिशत गिरावट को निश्चित मानकर खरीदारी टालना या तुरंत खरीद लेना सही रणनीति नहीं माना जा सकता।

भले ही भारत सरकार आयात शुल्क घटा दे, लेकिन सोने की कीमत पर वैश्विक बाजार का प्रभाव बना रहेगा।

अगर उसी समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत तेज होती है, तो भारत में ड्यूटी कटौती का पूरा फायदा घरेलू ग्राहकों को नहीं मिल सकता। दूसरी तरफ अगर अंतरराष्ट्रीय कीमत भी नीचे आती है और भारत में आयात शुल्क भी घटता है, तो गिरावट अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकती है।

इसलिए आने वाले समय में तीन चीजें खास तौर पर महत्वपूर्ण रहेंगी- अंतरराष्ट्रीय सोने का भाव, रुपये की डॉलर के मुकाबले स्थिति और भारत की आयात शुल्क नीति।

फिलहाल सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाने को लेकर चर्चा ने बाजार और ग्राहकों का ध्यान खींचा है। लेकिन जब तक सरकार की ओर से आधिकारिक घोषणा नहीं होती, तब तक संभावित कटौती को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।

मौजूदा नीति में 2026 में ड्यूटी बढ़ाकर 15 प्रतिशत किए जाने के बाद सोने के आयात और मांग पर असर पड़ा है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने भी मांग में कमी का अनुमान जताया था।

अगर सरकार अब शुल्क कम करने का निर्णय लेती है, तो यह नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव होगा और इसका असर सोने की घरेलू कीमत, आयात, ज्वेलरी मांग और निवेश पर पड़ सकता है।

यानी सोना खरीदने वालों के लिए आने वाले दिनों में सरकार का फैसला बेहद अहम रहने वाला है। यदि इंपोर्ट ड्यूटी में बड़ी कटौती होती है, तो सोने की कीमतों में उल्लेखनीय राहत संभव है और इसी वजह से बाजार की नजर अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।

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  • Manisha Gupta

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