
कुशीनगर/गोविंद पटेल की रिपोर्ट: जिले की कसया तहसील क्षेत्र स्थित कुड़वा दिलीपनगर के प्राचीन सिद्धपीठ मां कुलकुला देवी मंदिर को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। मंदिर के पारंपरिक प्रबंधन और विवादित भूमि को लेकर कुड़वा स्टेट परिवार ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए हस्तक्षेप और मनमानी कार्रवाई के आरोप लगाए हैं। मामले को लेकर क्षेत्र में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है और स्थानीय लोगों की नजरें प्रशासनिक एवं न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं।
कुड़वा स्टेट परिवार के सदस्य कुंवर नरेन्द्र कुमार सिंह और कुंवर सुरेन्द्र कुमार सिंह का कहना है कि मां कुलकुला देवी मंदिर वर्षों से उनके परिवार के संरक्षण और देखरेख में संचालित होता रहा है। उनका आरोप है कि प्रशासनिक कार्रवाई के नाम पर उनके पारंपरिक अधिकारों की अनदेखी की जा रही है तथा मंदिर से जुड़े मामलों में बाहरी लोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। परिवार का दावा है कि मंदिर की व्यवस्था और संरक्षण की जिम्मेदारी लंबे समय से उनके परिवार द्वारा निभाई जाती रही है।
स्टेट परिवार का कहना है कि मंदिर से जुड़ी विवादित भूमि के संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। परिवार के अनुसार रिट संख्या 47794/2002 में एक नवंबर 2002 को पारित आदेश के तहत याचिकाकर्ताओं को विवादित भूमि से बेदखल किए जाने पर रोक लगाई गई थी। उनका आरोप है कि न्यायालय के इस आदेश के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप जारी है, जिससे क्षेत्र में असंतोष की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
वहीं जिला प्रशासन का पक्ष अलग है। प्रशासन का कहना है कि मंदिर परिसर और हिरण्यवती नदी क्षेत्र के विकास, सौंदर्यीकरण तथा पर्यटन संभावनाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभिन्न योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है। प्रशासन का दावा है कि सभी गतिविधियां नियमानुसार और जनहित को ध्यान में रखकर संचालित की जा रही हैं तथा विकास कार्यों का उद्देश्य क्षेत्र को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है। मंदिर से जुड़ा यह विवाद अब केवल भूमि स्वामित्व के मुद्दे तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ धार्मिक आस्था, पारंपरिक प्रबंधन अधिकार, प्रशासनिक हस्तक्षेप और विकास योजनाओं जैसे कई पहलू भी जुड़ गए हैं। यही कारण है कि यह मामला स्थानीय स्तर पर लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।
क्षेत्र के लोगों का मानना है कि मां कुलकुला देवी मंदिर धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है और इससे जुड़ा कोई भी निर्णय सभी पक्षों की सहमति और कानून के दायरे में होना चाहिए। फिलहाल एक ओर स्टेट परिवार न्यायालय के पुराने आदेशों का हवाला देकर अपने अधिकारों की बात कर रहा है, जबकि दूसरी ओर प्रशासन विकास कार्यों को प्राथमिकता बता रहा है। ऐसे में आने वाले समय में इस विवाद की दिशा और समाधान को लेकर सभी की निगाहें प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं।
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