मोहन यादव सरकार की जड़ें खोदते ‘विभीषण’: रामखेलावन पटेल का ‘आंदोलन’ या सत्ता के लिए ब्लैकमेलिंग का नया पैंतरा?

विशेष रिपोर्ट: ब्रांडवाणी समाचार | भोपाल/अमरपाटन। मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा चेहरा चर्चा में है, जो खाता भाजपा का है लेकिन गाता अपनी ही धुन है। पूर्व मंत्री और अमरपाटन के कद्दावर नेता रामखेलावन पटेल ने अपनी ही सरकार के खिलाफ जो ‘बगावती बिगुल’ फूंका है, उसने यह साफ कर दिया है कि उनके लिए ‘संगठन और निष्ठा’ गौण है, और ‘कुर्सी की मलाई’ सर्वोपरि।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जहां एक ओर निवेश और राजस्व के जरिए मध्य प्रदेश को ‘स्वर्णिम युग’ की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं रामखेलावन पटेल जैसे नेता विकास की पटरी पर पत्थर बनकर खड़े हो गए हैं।

डॉ. मोहन यादव की सरकार का मुख्य लक्ष्य खनिज संसाधनों के सही दोहन से प्रदेश की झोली भरना है। लेकिन विडंबना देखिए, भाजपा के ही पूर्व मंत्री कंपनियों को निशाना बनाकर, जनता को गुमराह कर रहे हैं।

मकसद क्या है? क्या यह वाकई जनहित है, या फिर माइनिंग कंपनियों से अपनी ‘लेन-देन’ की सेटिंग न हो पाने का गुस्सा?

डॉ. मोहन यादव की सरकार का मुख्य लक्ष्य खनिज संसाधनों के सही दोहन से प्रदेश की झोली भरना है। लेकिन विडंबना देखिए, भाजपा के ही पूर्व मंत्री कंपनियों को निशाना बनाकर, जनता को गुमराह कर रहे हैं।

  • मकसद क्या है? क्या यह वाकई जनहित है, या फिर माइनिंग कंपनियों से अपनी ‘लेन-देन’ की सेटिंग न हो पाने का गुस्सा?
  • निशाना कौन? सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की नीतियां, ताकि सरकार को अस्थिर और बदनाम किया जा सके।

रामखेलावन पटेल अक्सर खुद को पिछड़ा वर्ग का मसीहा बताते हैं, लेकिन सच तो यह है कि जब-जब उन्हें सत्ता के गलियारों से बाहर किया जाता है, उन्हें अचानक ‘जनता की याद’ आने लगती है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह आंदोलन सिर्फ एक ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ है ताकि:

  1. सरकार घुटने टेके और उन्हें दोबारा मंत्री पद का ‘तोहफा’ मिले।
  1. संगठन में उनकी गिरती साख को ‘विद्रोही तेवरों’ से ऑक्सीजन दी जा सके।

ब्रांडवाणी का तीखा सवाल: “क्या डॉ. मोहन यादव जैसे अनुशासित मुख्यमंत्री के राज में एक पूर्व मंत्री को इतनी छूट मिलनी चाहिए कि वह सरकारी खजाने को चूना लगाने वाली गतिविधियों का नेतृत्व करे?”

भाजपा अपने कड़े अनुशासन के लिए जानी जाती है, लेकिन रामखेलावन पटेल के मामले में प्रदेश नेतृत्व की चुप्पी कार्यकर्ताओं को खल रही है। निचले स्तर का कार्यकर्ता पूछ रहा है “क्या हम दिन-रात मेहनत इसलिए करते हैं कि हमारे ही नेता सरकार की छवि धूमिल करें?”

यह ‘डबल गेम’ अब ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है। एक तरफ भाजपा की सदस्यता और दूसरी तरफ सरकार के खिलाफ सड़कों पर नौटंकी यह दोहरा चरित्र जनता के सामने बेनकाब हो चुका है।

रामखेलावन पटेल को यह मुगालता छोड़ देना चाहिए कि वे सरकार को डराकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक लेंगे। डॉ. मोहन यादव की सरकार विकास के पथ पर अग्रसर है और ऐसे रोड़ों को हटाना वह बखूबी जानती है। अब गेंद भाजपा हाईकमान के पाले में है क्या वे ऐसे ‘ब्लैकमेलर’ को ढोते रहेंगे या उसे बाहर का रास्ता दिखाकर एक मिसाल पेश करेंगे?

ब्यूरो रिपोर्ट: ब्रांडवाणी समाचार

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

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