
भोपाल। मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों से ‘अजब-गजब’ कारनामे अक्सर सामने आते रहते हैं, लेकिन ताजा मामला भ्रष्टाचार की जांच को दबाने और रसूखदार अधिकारियों को बचाने की पराकाष्ठा को पार कर गया है। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे डॉ. धीरेंद्र कुमार पांडे के खिलाफ जांच का एक पत्र ईओडब्ल्यू (आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो) के कार्यालय से निकलकर महज 1 किलोमीटर दूर वल्लभ भवन मंत्रालय तक पहुँचने में पूरे 10 महीने लग गए।
आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की महानिदेशक श्रीमती पल्लवी त्रिवेदी द्वारा 6 जून 2025 को लिखा गया पत्र मंत्रालय के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग को कथित तौर पर 10 महीने की देरी से मिला। विभाग के सचिव ने खुद अपनी नोटशीट में यह सनसनीखेज टिप्पणी की है कि ईओडब्ल्यू का पत्र विलंब से मिलने के कारण डॉ. धीरेंद्र पांडे पर भ्रष्टाचार संबंधी कार्रवाई करने में देरी हो रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या ईओडब्ल्यू और मंत्रालय के बीच का यह 1 किलोमीटर का फासला तय करने में पत्र को “100 साल की उम्र” चाहिए? या फिर यह देरी जानबूझकर की गई ताकि भ्रष्टाचारी को साक्ष्य मिटाने और बचने का पर्याप्त समय मिल सके?
डॉ. धीरेंद्र पांडे जैसे विवादित अधिकारी के पास आखिर ऐसी कौन सी जादुई ताकत है कि पूरी सरकार और प्रशासनिक अमला उनके सामने नतमस्तक नजर आ रहा है? चर्चाएं आम हैं कि आर्थिक अपराध ब्यूरो से लेकर मंत्रालय के शीर्ष स्तर तक डॉ. पांडे को “ऊपर” से संरक्षण प्राप्त है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव श्री एम. सेल्वेंद्रम की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर क्यों प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी अपने ही विभाग के एक दागी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई करने के बजाय रास्ते खोज रहे हैं? क्या यह संरक्षण डॉ. पांडे के व्यक्तिगत रसूख के कारण है या फिर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कार्रवाई होने पर कई बड़े चेहरे बेनकाब हो सकते हैं?
भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की बातें करने वाली सरकार के लिए यह आईना है। एक तरफ पंजाब जैसे राज्यों में भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही मंत्रियों तक को जेल भेज दिया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश में डॉ. पांडे जैसे अधिकारी इतने शक्तिशाली हैं कि मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री स्तर तक की चुप्पी संदिग्ध लगती है। आखिर क्या कारण है कि जिस अधिकारी पर तत्काल एफआईआर (FIR) होनी चाहिए थी, उसे बचाने के लिए मंत्रालय के गलियारों में ‘धृतराष्ट्र’ जैसी परंपरा विकसित की जा रही है?
एक आम नागरिक अगर एक रुपये की चोरी करे तो पुलिस और कानून का शिकंजा उसे जेल की सलाखों के पीछे भेज देता है, लेकिन करोड़ों के घोटाले के साक्ष्य होने के बावजूद डॉ. पांडे खुलेआम कानून का मजाक उड़ा रहे हैं। यह कार्यशैली जनता को संदेश दे रही है कि यदि आप रसूखदार हैं और आपके ऊपर “साहब” का हाथ है, तो कानून आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
ब्रांडवाणी समाचार का सीधा सवाल?
* क्या डॉ. धीरेंद्र पांडे को बचाने के लिए जानबूझकर पत्रों को फाइलों के नीचे दबाया जा रहा है?
* प्रमुख सचिव एम. सेल्वेंद्रम इस मामले पर मौन क्यों हैं और विभागीय कार्रवाई को शिथिल करने के लिए उन पर किसका दबाव है?
* क्या मध्य प्रदेश में भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देना अब एक नई प्रशासनिक परिपाटी बन चुकी है?
ब्रांडवाणी समाचार इस महाघोटाले की परतों को उधेड़ता रहेगा। जब तक डॉ. धीरेंद्र पांडे जैसे भ्रष्ट अधिकारियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई और एफआईआर नहीं होती, हमारी आवाज दबने वाली नहीं है। मध्य प्रदेश की आम जनता की गाढ़ी कमाई को ‘मौज-मस्ती’ में उड़ाने वाले अधिकारियों का हिसाब होना ही चाहिए।
ब्यूरो रिपोर्ट: ब्रांडवाणी समाचार, भोपाल
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