लोकायुक्त की रडार पर पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. सुशील मंडेरिया: गंभीर आरोपों के बाद भी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अनुराग जैन का मौन क्यों?

भोज मुक्त विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार के विरुद्ध जांच तेज, शासन की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल — ज़ीरो टॉलरेंसके दावों की खुली पोल।

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार उन्मूलन के बड़े-बड़े दावों और ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति पर एक बार फिर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन द्वारा जारी एक अत्यंत संवेदनशील और आधिकारिक पत्र ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। लोकायुक्त कार्यालय (समाधान भवन, भोपाल) द्वारा शिकायत क्रमांक 0477/सी/2026 के अंतर्गत मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार एवं जीवाजी विश्वविद्यालय के वर्तमान असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुशील मंडेरिया के विरुद्ध गंभीर भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की प्रक्रिया को तीव्र कर दिया गया है। लोकायुक्त संगठन के विधि सलाहकार ने शिकायतकर्ता से आरोपों की पुष्टि हेतु शपथ पत्र एवं आवश्यक साक्ष्य मांगे हैं, जो यह स्पष्ट करता है कि प्रथम दृष्टया आरोपों में दम है।

गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप: प्राप्त जानकारी के अनुसार, डॉ. सुशील मंडेरिया पर भोज मुक्त विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार के पद पर रहते हुए व्यापक वित्तीय अनियमितताओं, पद के दुरुपयोग और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के बेहद गंभीर आरोप हैं। लोकायुक्त कार्यालय द्वारा जारी पत्र संख्या 1913 दिनांक 03.06.2026 के माध्यम से मेरठ के के.पी. प्रिंटर्स के प्रोपराइटर राजीव शर्मा को निर्देशित किया गया था कि वे इन गंभीर आरोपों के समर्थन में अपने पास उपलब्ध समस्त दस्तावेज और शपथ पत्र संगठन को उपलब्ध कराएं। इस शासकीय कार्रवाई से स्पष्ट है कि मंडेरिया के विरुद्ध जांच का शिकंजा निरंतर कसता जा रहा है।

शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी पर तीखे सवाल: मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव क्यों हैं मौन? इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला और चिंताजनक पहलू प्रदेश के शीर्ष राजनैतिक और प्रशासनिक नेतृत्व का मौन है। डॉ. सुशील मंडेरिया जैसे दागी और जांच के दायरे में घिरे अधिकारी के विरुद्ध इतने गंभीर साक्ष्य सामने आने के बाद भी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अनुराग जैन के कार्यालय द्वारा अब तक कोई दंडात्मक या निलंबन की कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जनता के बीच यह सवाल अत्यंत प्रखरता से उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) और मुख्य सचिव का कार्यालय ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण दे रहा है? ऐसे अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित न किया जाना, शासन की मंशा पर गहरे संदेह उत्पन्न करता है।

प्रशासनिक व्यवस्था का दुर्भाग्य और जनता का आक्रोश: आम जनता और जागरूक नागरिकों का मानना है कि मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के नाम पर केवल औपचारिकताएं और दिखावा (चुटियापा) किया जा रहा है, जबकि धरातल की कड़वी सच्चाई इसके सर्वथा विपरीत है। वर्तमान परिदृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासनिक तंत्र में ईमानदारी और शुचिता को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया है। जो अधिकारी जितना अधिक अनियमितताओं में संलिप्त पाया जाता है, उसका प्रभाव और रसूख उतना ही बढ़ता जाता है। यह मध्य प्रदेश की जनता का दुर्भाग्य ही है कि शासन-प्रशासन ऐसे तत्वों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने के बजाय पूरी तरह से मूकदर्शक बना हुआ है।

तत्काल निलंबन और पारदर्शी जांच की मांग: ब्रांडवाणी समाचार इस रिपोर्ट के माध्यम से शासन से सीधे सवाल करता है कि जांच प्रभावित होने से रोकने के लिए डॉ. सुशील मंडेरिया को अब तक निलंबित क्यों नहीं किया गया? लोकायुक्त की इस सक्रियता के बाद क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपनी ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति को चरितार्थ करते हुए इस पर कड़ा संज्ञान लेंगे, या फिर मुख्य सचिव अनुराग जैन की फाइलों के नीचे यह मामला भी हमेशा के लिए दबा दिया जाएगा? प्रदेश की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है, उसे धरातल पर कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई की प्रतीक्षा है।

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार खत्म करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, मंचों से ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ के नारे गूंजते हैं। लेकिन क्या यह केवल एक दिखावा है? क्या मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार मिटाने का केवल नाटक रचा जा रहा है? हम यह सवाल इसलिए उठा रहे हैं, क्योंकि एक बेहद गंभीर मामला सामने आने के बाद भी सूबे के आलाकमान की चुप्पी रहस्यमयी बनी हुई है।

मामला जुड़ा है मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार और वर्तमान में जीवाजी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुशील मंडेरिया से। लोकायुक्त संगठन (समाधान भवन, भोपाल) ने शिकायत क्रमांक 0477/सी/2026 के तहत डॉ. मंडेरिया के खिलाफ जांच की रफ्तार तेज कर दी है। लोकायुक्त के विधि सलाहकार ने मेरठ के के.पी. प्रिंटर्स के प्रोपराइटर राजीव शर्मा से मंडेरिया के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के समर्थन में 29 जून 2026 तक शपथ पत्र और पुख्ता सबूत मांगे हैं।

आरोप बेहद गंभीर हैं—वित्तीय हेराफेरी, पद का दुरुपयोग और प्रशासनिक कदाचार। लेकिन सबसे बड़ा सवाल लोकायुक्त की इस कार्रवाई पर नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश शासन के सर्वोच्च पदों पर बैठे कर्णधारों पर है!

आखिर इतने गंभीर आरोपों और लोकायुक्त की सक्रियता के बावजूद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कार्यालय और मुख्य सचिव अनुराग जैन का कार्यालय मौन क्यों है? एक भ्रष्ट और दागी अधिकारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित क्यों नहीं किया गया? क्या मध्य प्रदेश का यह दूर्भाग्य नहीं है कि यहाँ ईमानदारी को हाशिए पर रख दिया गया है और जो जितना बड़ा घोटाला करता है, उसका रसूख उतना ही ऊपर बढ़ता जाता है?

जनता पूछ रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कैसी लड़ाई है जहाँ फाइलें सामने होने पर भी कार्रवाई की कलम रुक जाती है? क्या मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव इस मामले में कोई कड़ा कदम उठाएंगे, या दागी अधिकारियों को ऐसे ही अभयदान मिलता रहेगा?

इस पूरे मामले पर ब्रांडवाणी समाचार की नजर बनी हुई है। पल-पल की अपडेट के लिए जुड़े रहिए हमारे साथ। धन्यवाद।”

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gaurav singh rajput

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