
ब्रांडवाणी की रिपोर्ट:पुलिस महकमे में अनुशासन की दुहाई देना एक बात है और उसे निभाना दूसरी। ताजा मामला एक जिले के पुलिस कप्तान और उनके एक ‘खास’ मातहत के बीच के उस अजीबोगरीब तालमेल का है, जिसने पूरे विभाग की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है।
ब्रांडवाणी का सवाल सीधा सवाल करता है- क्या महकमे का एक हेड कांस्टेबल इतना रसूखदार हो सकता है कि जिले के सबसे बड़े अधिकारी यानी एसपी साहब की बोलती ही बंद हो जाए? इस रहस्यमयी चुप्पी के पीछे कोई साधारण कारण नहीं, बल्कि एक गहरा ‘लेन-देन’ और रसूख का खेल है। चर्चा गरम है कि यह हेड कांस्टेबल पुलिस कप्तान तक ‘मोटी रकम’ पहुँचाने का सबसे भरोसेमंद जरिया बना हुआ था। सिर्फ इतना ही नहीं, महकमे के भीतर दबी जुबान में यह भी कहा जा रहा है कि इस मातहत के पास साहब के कुछ ऐसे ‘डार्क सीक्रेट्स’ हैं, जो अगर बाहर आ गए तो कुर्सी बचना मुश्किल हो जाएगा। शायद यही वजह है कि कार्रवाई की कलम आज कांप रही है।
सिस्टम की लाचारी: आखिर कौन है असली मास्टरमाइंड?
सवाल खड़ा होता है कि एक प्रमोटेड आईपीएस अधिकारी इतना मजबूर कैसे हो सकता है कि वह अपने ही एक कर्मचारी की मनमानी पर चुप्पी साध ले? विभाग की गरिमा को दांव पर लगाकर आखिर किसे बचाया जा रहा है? ब्रह्मवाणी समाचार इस पूरे सिंडिकेट की तह तक जाएगा। हम प्रशासन से सीधा सवाल पूछते हैं—क्या वर्दी का इकबाल अब चंद ‘सीक्रेट्स’ और ‘सिक्कों’ का गुलाम बन चुका है?
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