
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की खबरों के बाद क्रूड ऑयल की कीमतें करीब 4.8 प्रतिशत तक टूट गईं और यह 83 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। निवेशकों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच समझौता होता है तो वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव बना रहेगा। इसी उम्मीद ने ऊर्जा बाजार में तेजी से प्रतिक्रिया पैदा की है।
विशेषज्ञों के अनुसार ईरान पर लगे प्रतिबंधों में संभावित ढील मिलने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों बैरल अतिरिक्त तेल की आपूर्ति संभव हो सकती है। लंबे समय से भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति संबंधी चिंताओं के कारण तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई थीं। हालांकि हालिया कूटनीतिक संकेतों ने निवेशकों की धारणा बदल दी है और बाजार अब अधिक आपूर्ति की संभावना को ध्यान में रखकर प्रतिक्रिया दे रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस गिरावट का सकारात्मक असर वैश्विक शेयर बाजारों पर भी देखने को मिला। अमेरिका, यूरोप और एशिया के प्रमुख शेयर सूचकांकों में तेजी दर्ज की गई। निवेशकों को उम्मीद है कि ऊर्जा लागत कम होने से कंपनियों के खर्च में कमी आएगी और महंगाई पर भी दबाव घटेगा। इसी वजह से बैंकिंग, ऑटोमोबाइल, एविएशन और विनिर्माण क्षेत्र के शेयरों में खरीदारी बढ़ी।
भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए भी यह स्थिति राहत देने वाली मानी जा रही है। यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक निचले स्तर पर बनी रहती हैं तो इससे आयात बिल कम हो सकता है, महंगाई नियंत्रण में मदद मिल सकती है और आर्थिक विकास को समर्थन मिल सकता है। हालांकि बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अंतिम प्रभाव अमेरिका-ईरान वार्ता के नतीजों और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
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