वल्लभ भवन में ‘बाबू’ बनकर रह गए प्रदेश के युवा SDM; फील्ड के अनुभव पर ‘सिस्टम’ का ग्रहण ?

भोपाल | मध्यप्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था और नियुक्तियों के गलियारों से एक ऐसी खबर आ रही है जो प्रदेश के भविष्य और नई प्रशासनिक पौध को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। लोक सेवा आयोग (PSC) की कठिन परीक्षा पास कर जब एक युवा डिप्टी कलेक्टर या SDM बनने का सपना लेकर आता है, तो उसका लक्ष्य जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं का समाधान करना और फील्ड का अनुभव लेना होता है। लेकिन वर्तमान में यह ‘अनुभव’ फाइलों के बोझ तले दबता नजर आ रहा है।

आजकल देखने में आ रहा है कि PSC के जरिए चयनित होकर आए ऊर्जावान युवा अधिकारियों को सीधे वल्लभ भवन (मंत्रालय) में लाकर पदस्थ कर दिया जा रहा है। जिस उम्र और जिस समय में इन अधिकारियों को मैदानी स्तर (फील्ड) पर रहकर प्रशासन की बारिकियाँ सीखनी चाहिए, उस समय उनसे मंत्रालय में बाबूओं की तरह फाइलें तैयार करवाई जा रही हैं। सवाल यह है कि क्या भविष्य के कलेक्टर और नीति निर्माता बिना मैदानी हकीकत जाने प्रदेश को बेहतर प्रशासन दे पाएंगे?

सत्ता के गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि सूत्रों के अनुसार कहा जाता है की पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समय एक निश्चित व्यवस्था थी। कहा जाता था कि नीरज वशिष्ठ से मिलो, काम हो जाएगा और फील्ड पोस्टिंग मिल जाएगी।” लेकिन आज हालात जुदा हैं। नए युवा अधिकारियों के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि आखिर वे अपनी बात रखने के लिए मिलें तो किससे मिलें? पोस्टिंग कराने वालों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है, क्योंकि करने वालो की कतार बहुत है लेकिन हमारी कतार की स्थिरता नहीं है आज कल तो व्यवस्था का भी बड़ा बोल वाला है अब ये व्यवस्था जाएगी कहा पता नहीं लेकिन योग्यता और फील्ड वर्क की चाह रखने वाले युवाओं को केवल इंतजार हाथ लग रहा है।

प्रदेश में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है, और अब यह संक्रमण नियुक्तियों के ‘मैनेजमेंट’ तक पहुँच चुका है।

  • अनुराग जैन (मुख्य सचिव):एक तरफ मुख्य सचिव लगातार अधिकारियों को ईमानदारी का पाठ पढ़ा रहे हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात कर रहे हैं।
  • एम. सेलवेंद्रम (प्रमुख सचिव, GAD):उन्हें एक भारी-भरकम और ईमानदार छवि वाला IAS अधिकारी माना जाता है। इनके लिए जो काम न करना हो उसका रास्ता नहीं निकलता बल्कि नियम का हवाला दे देते हैं

परंतु, विडंबना देखिए कि शीर्ष पर बैठे इन अधिकारियों की सख्ती के बावजूद जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार कम होने का नाम नहीं ले रहा। इन्वेस्टर समिट के नाम पर जो खेल चल रहा है, उसने प्रदेश के नए स्टार्टअप्स और स्थानीय व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। बाहरी इन्वेस्टरों के साथ ‘सेटिंग’ करके सीधे टेंडर प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा है, जो अब सबसे आसान ‘पैंतरा’ बन चुका है।

जिस तरह प्रदेश में कलेक्टरों की सूची को लेकर लगातार मंथन चलता रहता है, उसी तरह अब सवाल उठ रहा है कि PCS अधिकारियों (डिप्टी कलेक्टर/SDM) की सूची कब आएगी?

  • क्या इन युवाओं को केवल वल्लभ भवन में दबाकर रखा जाएगा?
  • क्या इनका उपयोग केवल फाइलें सरकाने के लिए होगा?
  • क्या राजनीतिक रसूख ही फील्ड पोस्टिंग का एकमात्र पैमाना बनेगा?

ब्रांडवाणी समाचार यह सवाल उठाता है कि यदि इन अधिकारियों को फील्ड का ज्ञान ही नहीं होगा, तो आने वाले समय में मध्यप्रदेश के प्रशासन का ढांचा कैसा होगा? प्रदेश की जनता और ये युवा अधिकारी अब टकटकी लगाए बैठे हैं कि कब सरकार इस ‘मैनेजमेंट’ के चक्रव्यूह को तोड़कर योग्य अधिकारियों को जनता की सेवा के लिए मैदान में उतारेगी।

ब्यूरो रिपोर्ट: ब्रांडवाणी समाचार

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gaurav singh rajput

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