
भारत में तेजी से बढ़ते डिजिटलीकरण के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है। ट्रांसयूनियन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार देश में डिजिटल फ्रॉड का जोखिम वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुना हो गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि विभिन्न उद्योगों में साइबर अपराधी लगातार नए तरीके अपनाकर लोगों और कंपनियों को निशाना बना रहे हैं। बढ़ते डिजिटल लेनदेन, ई-कॉमर्स गतिविधियों और ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार ने जहां उपभोक्ताओं को सुविधा प्रदान की है, वहीं धोखाधड़ी के नए अवसर भी पैदा किए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक लॉजिस्टिक्स सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है, जहां लगभग 16.3 प्रतिशत संदिग्ध या धोखाधड़ी वाली गतिविधियां दर्ज की गई हैं। ऑनलाइन डिलीवरी, सप्लाई चेन प्रबंधन और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम के व्यापक उपयोग के कारण यह क्षेत्र साइबर अपराधियों के लिए आकर्षक लक्ष्य बन गया है। फर्जी ऑर्डर, नकली पहचान, भुगतान धोखाधड़ी और अकाउंट टेकओवर जैसे मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि लॉजिस्टिक्स कंपनियों को अपने साइबर सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
डिजिटल फ्रॉड केवल कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम उपभोक्ता भी इसके शिकार बन रहे हैं। फिशिंग लिंक, फर्जी कॉल, नकली ऐप्स और सोशल इंजीनियरिंग तकनीकों के माध्यम से साइबर ठग लोगों की व्यक्तिगत और वित्तीय जानकारी चुराने का प्रयास कर रहे हैं। जैसे-जैसे डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता की आवश्यकता भी बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञ उपभोक्ताओं को संदिग्ध लिंक से बचने, मजबूत पासवर्ड का उपयोग करने और दो-स्तरीय प्रमाणीकरण अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत की तेजी से विकसित होती डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए साइबर सुरक्षा अब एक महत्वपूर्ण चुनौती बन चुकी है। यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म, वित्तीय संस्थान और लॉजिस्टिक्स कंपनियां उन्नत सुरक्षा तकनीकों में निवेश नहीं करती हैं, तो भविष्य में फ्रॉड की घटनाएं और बढ़ सकती हैं। ऐसे में सरकार, निजी क्षेत्र और उपभोक्ताओं के बीच समन्वित प्रयास ही डिजिटल धोखाधड़ी के बढ़ते खतरे को नियंत्रित करने में प्रभावी साबित होंगे।
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